'घर जाओ, कोई नहीं रोक रहा...' कश्मीरी पंडितों पर फूटा फारूक अब्दुल्ला का गुस्सा, जानिए पूरा मामला

कश्मीरी पंडितों के घर वापसी के मुद्दे पर आज जम्मू-कश्मीर नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेता फारूक अब्दुल्ला ने खुलकर बात की है. उन्होंने साफ-साफ कहा है कि किसी ने उन्हें रोक नहीं रखा है. वे जब चाहें अपने घर लौट सकते हैं.

Sonee Srivastav

नई दिल्ली: जम्मू-कश्मीर नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेता फारूक अब्दुल्ला ने कश्मीरी पंडितों के घर वापसी के मुद्दे पर खुलकर बात की. कश्मीरी पंडित पलायन दिवस पर पत्रकारों के सवाल पर उन्होंने कहा कि किसी ने उन्हें रोक नहीं रखा है. वे जब चाहें अपने घर लौट सकते हैं. फारूक ने बताया कि घाटी में कई पंडित परिवार अभी भी शांतिपूर्ण तरीके से अपने गांवों में रह रहे हैं. 

उन्होंने अपने कार्यकाल का जिक्र करते हुए कहा कि उस समय उन्होंने पंडितों को घर बनाने का प्रस्ताव दिया था, लेकिन बाद में सरकार बदल गई. अब यह जिम्मेदारी केंद्र सरकार पर है कि वे इस दिशा में कदम उठाए. फारूक का मानना है कि पंडितों की वापसी में कोई बाधा नहीं है और उन्हें बेझिझक लौटना चाहिए.

उपमुख्यमंत्री ने किया समर्थन

जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री सुरिंदर चौधरी ने भी इस मुद्दे पर अपनी राय रखी. उन्होंने कहा कि नेशनल कॉन्फ्रेंस हमेशा से कश्मीरी पंडितों की घाटी में वापसी की पक्षधर रही है. चौधरी के अनुसार, अगर पंडित समुदाय कश्मीर लौटना चाहता है तो उनका पुनर्वास जरूर होना चाहिए. 

उन्होंने कश्मीर की सुंदरता को पंडितों के बिना अधूरा बताया और उम्मीद जताई कि केंद्र सरकार जल्द ही इस पर फैसला लेगी. चौधरी का कहना है कि पंडितों को उनके मूल घरों में सुरक्षित तरीके से बसाने से घाटी की पुरानी सांस्कृतिक एकता फिर से मजबूत होगी. 

पलायन का दर्दनाक इतिहास

दरअसल कश्मीरी पंडित पलायन दिवस हर साल 19 जनवरी को मनाया जाता है, जो इस समुदाय के लिए एक काला दिन की याद दिलाता है.1990 में कश्मीर घाटी में उग्रवाद और धार्मिक कट्टरता चरम पर पहुंच गई थी. 19 जनवरी की रात को मस्जिदों से लाउडस्पीकरों पर कश्मीरी हिंदुओं को धमकी दी गई कि या तो वे इस्लाम अपनाएं, मारे जाएं या घाटी छोड़ दें.

इस वजह से हजारों परिवारों को अपनी जड़ें उखाड़कर भागना पड़ा. अनुमान के मुताबिक, 90 हजार से लेकर एक लाख से ज्यादा पंडित परिवारों ने अपना घर-बार छोड़ा, जो घाटी की कुल हिंदू आबादी का बड़ा हिस्सा था. इस दौरान चुनिंदा हत्याएं, महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार, लूटपाट और संपत्ति को आग लगाने जैसी घटनाएं आम हो गई.

पंडित समुदाय की यह प्राचीन विरासत सदियों पुरानी थी, लेकिन हिंसा ने सब कुछ तबाह कर दिया. आज भी कई परिवार जम्मू या देश के अन्य हिस्सों में निर्वासित जीवन जी रहे हैं.

वापसी की राह में चुनौतियां

कश्मीरी पंडितों की घर वापसी की मांग लंबे समय से उठ रही है, लेकिन सुरक्षा और पुनर्वास की कमी से यह सपना अधूरा है. फारूक और चौधरी जैसे नेताओं के बयान से उम्मीद बंधती है, लेकिन केंद्र सरकार को ठोस कदम उठाने होंगे. जैसे कि सुरक्षित आवास, रोजगार और सामाजिक एकीकरण सुनिश्चित करना. 

घाटी में शांति बहाली से ही पंडितों का विश्वास जीता जा सकता है. यह मुद्दा न सिर्फ मानवीय है, बल्कि कश्मीर की विविधता को बचाने का भी सवाल है. समाज को मिलकर इस दिशा में काम करना चाहिए ताकि पुरानी घाव भर सकें.

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