गणतंत्र दिवस पर EU की मौजूदगी, भारत का बड़ा दांव, खालिस्तान और ISI में घबराहट क्यों

गणतंत्र दिवस पर यूरोपीय संघ की ऐतिहासिक भागीदारी केवल प्रतीक नहीं है। यह भारत की रणनीतिक सोच, वैश्विक भरोसे और अलगाववादी राजनीति के लिए सीधी चुनौती का संकेत है।

Lalit Sharma
Edited By: Lalit Sharma

कर्तव्य पथ पर इस बार जो होने जा रहा है, वह सामान्य परेड नहीं है। यूरोपीय संघ के प्रतिनिधियों का मार्च करना भारत के लिए एक कूटनीतिक बयान है। यह संदेश है कि भारत अब सिर्फ सुनने वाला देश नहीं रहा। यह संदेश है कि भारत अपने साझेदार खुद चुनता है। यूरोप का साथ यह बताता है कि भारत पर भरोसा बढ़ा है। यह भरोसा व्यापार से आगे बढ़कर सुरक्षा तक पहुंचा है। यही बात खालिस्तानी संगठनों को सबसे ज्यादा चुभ रही है। क्योंकि अब उनका नैरेटिव कमजोर पड़ रहा है।

यूरोप की मौजूदगी से खालिस्तानी इकोसिस्टम क्यों हिला?

अब तक खालिस्तानी नेटवर्क यूरोप को सुरक्षित मंच मानते रहे। वहां रैलियां हुईं। वहां फंडिंग हुई। वहां बयानबाज़ी चली। सब कुछ अभिव्यक्ति की आज़ादी के नाम पर हुआ। लेकिन जब EU का नेतृत्व कर्तव्य पथ पर भारत के साथ खड़ा दिखता है, तो वह कवर हट जाता है। अब सवाल पूछे जाते हैं। अब फाइलें खुलती हैं। अब हिंसा और नेटवर्क की बात होती है। यही वजह है कि बेचैनी बढ़ी है। क्योंकि जब मंच सिकुड़ता है, तो साजिश भी सिमटती है।

EU शिखर सम्मेलन इस कहानी को कैसे बदलता है?

गणतंत्र दिवस के अगले दिन भारत-EU शिखर सम्मेलन होना सिर्फ संयोग नहीं है। यह एक सोची-समझी रणनीति है। व्यापार समझौता हो। रक्षा सहयोग हो। साइबर सुरक्षा हो। समुद्री सुरक्षा हो। आतंकवाद के खिलाफ साझा रणनीति हो। हर मुद्दा सीधे सुरक्षा से जुड़ा है। यूरोप अब भारत को बाजार ही नहीं, भागीदार मान रहा है। यह बदलाव धीरे-धीरे नहीं, साफ दिख रहा है। यही बदलाव उन ताकतों को डराता है जो धुंध में खेलती थीं।

ISI इस घटनाक्रम से सबसे ज्यादा परेशान क्यों है?

पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी ISI की रणनीति हमेशा परदे के पीछे काम करने की रही है। यूरोप उसके लिए अहम ज़मीन रहा है। वहीं से नेटवर्क चला। वहीं से फंड गया। वहीं से प्रचार हुआ। लेकिन जब भारत सबूतों के साथ यूरोप से बात करता है, तो खेल बदल जाता है। अब सवाल पूछे जाते हैं कि पैसा कहां से आया। अब पूछा जाता है कि संगठन शांतिपूर्ण हैं या हिंसक। ISI के लिए यही सबसे बड़ा झटका है।

हालिया घटनाएं क्यों यूरोप को भारत के करीब लाईं?

क्रोएशिया में भारतीय दूतावास पर हमला हो। विदेशों से आतंकी मॉड्यूल को फंडिंग के सबूत हों। डिजिटल ट्रांसफर और हवाला के लिंक सामने आएं। इन सबने यूरोप को सोचने पर मजबूर किया। यह सिर्फ भारत की समस्या नहीं रही। यह यूरोप की आंतरिक सुरक्षा का सवाल बन गया। जब खतरा साझा होता है, तो जवाब भी साझा होता है। यही वजह है कि यूरोप का रुख बदला है।

NIA की कार्रवाई ने अंतरराष्ट्रीय नैरेटिव कैसे बदला?

राष्ट्रीय जांच एजेंसी की चार्जशीट्स ने कहानी को मजबूत किया। आरोप सिर्फ बयान नहीं रहे। दस्तावेज बने। लिंक बने। नाम सामने आए। जब जांच कागज़ पर बोलती है, तो बहस खत्म होती है। यूरोप को यही सबूत दिखाए गए। और यूरोप ने उन्हें गंभीरता से लिया। यही वह मोड़ है जहां भावनात्मक राजनीति हारती है और तथ्य जीतते हैं।

यह गणतंत्र दिवस भारत का असली संदेश क्या है?

यह गणतंत्र दिवस कोई सांस्कृतिक शो नहीं है। यह शक्ति प्रदर्शन नहीं है। यह रणनीतिक स्पष्टता है। भारत बता रहा है कि वह अलगाववाद को बर्दाश्त नहीं करेगा। भारत बता रहा है कि साझेदारी शर्तों पर होगी। और भारत यह भी दिखा रहा है कि अब उसकी बात सुनी जाती है। यही वजह है कि खालिस्तानी नेटवर्क और ISI बेचैन हैं। क्योंकि यह परेड नहीं, परख है। और इस परख में भारत मजबूत दिख रहा है।

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