कालिंजर महादेव और बुंदेलखंड की सांस्कृतिक विरासत...इस बार यूपी की झांकी में क्या था सबसे अलग?

गणतंत्र दिवस पर कर्तव्य पथ में उत्तर प्रदेश की ‘विरासत से विकास’ झांकी ने कालिंजर किले, बुंदेलखंड की संस्कृति, ओडीओपी, पर्यटन और आधुनिक बुनियादी ढांचे के जरिए परंपरा व प्रगति के संतुलन को प्रभावशाली ढंग से दर्शाया.

Yaspal Singh
Edited By: Yaspal Singh

नई दिल्लीः इस वर्ष गणतंत्र दिवस के अवसर पर नई दिल्ली के कर्तव्य पथ पर उत्तर प्रदेश की झांकी ने अपनी विशिष्ट पहचान बनाई. ‘विरासत से विकास’ थीम पर आधारित इस झांकी के माध्यम से प्रदेश की ऐतिहासिक धरोहर, आध्यात्मिक परंपरा और आधुनिक विकास यात्रा को एक ही मंच पर प्रस्तुत किया गया. झांकी का केंद्र बिंदु बांदा जिले में स्थित प्राचीन कालिंजर किला रहा, जो सदियों से बुंदेलखंड की सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान का प्रतीक माना जाता है.

कालिंजर किला

झांकी में कालिंजर दुर्ग की भव्य आकृति को अत्यंत सूक्ष्म कलात्मकता के साथ उकेरा गया. यह किला न केवल स्थापत्य कला का उत्कृष्ट उदाहरण है, बल्कि यहां स्थित भगवान नीलकंठ महादेव का मंदिर आस्था का एक प्रमुख केंद्र भी है. इस प्रस्तुति के माध्यम से उत्तर प्रदेश ने यह संदेश दिया कि उसकी सांस्कृतिक विरासत आज भी जीवंत है और आने वाली पीढ़ियों को दिशा देने में सक्षम है.

बुंदेलखंड की आध्यात्मिक और सांस्कृतिक झलक

झांकी के अग्रभाग में कालिंजर की प्रसिद्ध एकमुख लिंग शैलाकृति को दर्शाया गया, जो बुंदेलखंड की प्राचीन आध्यात्मिक परंपराओं और शिल्प कौशल का प्रतीक है. यह हिस्सा दर्शकों को क्षेत्र की धार्मिक गहराई और ऐतिहासिक महत्व से परिचित कराता है. बुंदेलखंड की संस्कृति को जीवंत करने के लिए पारंपरिक रंग, आकृतियां और प्रतीकों का विशेष उपयोग किया गया.

ओडीओपी और स्थानीय कारीगरी का संदेश

झांकी के मध्य भाग में बुंदेलखंड की हस्तशिल्प कला, स्थानीय उत्पाद और पारंपरिक व्यवसायों को प्रदर्शित किया गया. ये सभी ‘एक जनपद एक उत्पाद’ योजना से जुड़े हैं, जो प्रदेश की आर्थिक आत्मनिर्भरता और स्थानीय उद्यमिता को बढ़ावा देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है. इस हिस्से ने यह दर्शाया कि परंपरागत कौशल आधुनिक अर्थव्यवस्था की रीढ़ बन सकता है.

पर्यटन और लोकसंस्कृति का जीवंत चित्रण

झांकी के पिछले हिस्से में बुंदेलखंड को एक उभरते पर्यटन केंद्र के रूप में प्रस्तुत किया गया. कालिंजर दुर्ग के ऐतिहासिक गलियारों में घूमते पर्यटकों और पारंपरिक वेशभूषा में बुंदेली कलाकारों के लोकनृत्य ने इस क्षेत्र की जीवंत जीवनशैली को दर्शाया. यह दृश्य उत्तर प्रदेश की सांस्कृतिक विविधता और पर्यटन क्षमता को राष्ट्रीय मंच पर मजबूती से स्थापित करता है.

आधुनिक विकास की ओर बढ़ता उत्तर प्रदेश

झांकी के अंतिम हिस्से में आधुनिक उत्तर प्रदेश की विकास यात्रा को दर्शाया गया. ब्रह्मोस मिसाइल, एक्सप्रेसवे नेटवर्क, औद्योगिक कॉरिडोर और आधुनिक आधारभूत संरचना के प्रतीकों ने यह स्पष्ट किया कि प्रदेश सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ा रहते हुए विकास की नई ऊंचाइयों को छू रहा है. यह प्रस्तुति परंपरा और प्रगति के संतुलन का सशक्त उदाहरण बनी.

परंपरा और प्रगति का संदेश

उत्तर प्रदेश की यह झांकी न केवल बुंदेलखंड की पहचान को राष्ट्रीय स्तर पर मजबूत करती है, बल्कि एक ऐसे नए भारत की तस्वीर भी पेश करती है, जो अपनी विरासत पर गर्व करते हुए भविष्य की ओर आत्मविश्वास से आगे बढ़ रहा है.

पिछली झांकी की स्मृति

गौरतलब है कि वर्ष 2025 में उत्तर प्रदेश की झांकी में महाकुंभ मेले की भव्यता को दर्शाया गया था, जिसमें संगम तट, अमृत कलश और साधु-संतों के पावन स्नान जैसे दृश्य आध्यात्मिक आस्था के प्रतीक बने थे.

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