कोई भी देश चुप्पी से महान नहीं बनता...कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए राहुल गांधी बोले- BJP और RSS जनता की आवाज नहीं सुनना चाहते
केरल में एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने कहा कि कोई भी देश तब तक महान नहीं बनता, जब तक कि उसके लोग अपने मतों को अपने स्वतंत्रता के साथ व्यक्त नहीं करते. इसके साथ ही उन्होंने कहा कि हमें लालच की संस्कृति को त्यागकर आवाज उठाना होगा. हमें अपने विचारों के लिए संघर्ष करना होगा.

केरल : कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने केरल में पार्टी कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर एक स्पष्ट और वैचारिक संदेश दिया. उन्होंने कहा कि कोई भी देश तब तक महान नहीं बन सकता, जब तक उसके नागरिक बिना डर और दबाव के अपने विचार सामने रखने का साहस नहीं करते. उनके अनुसार, विचारों को दबाना किसी भी समाज को अंदर से कमजोर कर देता है.
चुप्पी की संस्कृति पर सीधा हमला
लालच और खामोशी का आपसी संबंध
अपने विचार को आगे बढ़ाते हुए राहुल गांधी ने कहा कि चुप्पी के पीछे अक्सर लालच छिपा होता है. जब व्यक्ति यह सोचने लगता है कि जब तक उसकी निजी जरूरतें पूरी हो रही हैं, तब तक समाज में क्या हो रहा है, इससे उसे कोई फर्क नहीं पड़ता, तो वहीं से नैतिक पतन शुरू होता है. उन्होंने कहा कि अगर कोई व्यक्ति दूसरों के अपमान, हिंसा या मौत को देखकर भी खामोश रहता है, तो यह गंभीर सामाजिक बीमारी का संकेत है.
अभिव्यक्ति के लिए संघर्ष जरूरी
राहुल गांधी ने कार्यकर्ताओं से आह्वान किया कि वे अपने विचारों के लिए संघर्ष करने से पीछे न हटें. उन्होंने कहा कि महान लोग और महान देश वे होते हैं, जो सच बोलने का जोखिम उठाते हैं. लोकतंत्र में असहमति कोई अपराध नहीं, बल्कि व्यवस्था को मजबूत करने का माध्यम होती है.
सत्ता के केंद्रीकरण बनाम विकेंद्रीकरण की बहस
भाजपा, आरएसएस और कांग्रेस के बीच अंतर स्पष्ट करते हुए राहुल गांधी ने कहा कि मौजूदा सत्ताधारी विचारधारा सत्ता को केंद्र में सीमित रखना चाहती है, जबकि कांग्रेस सत्ता को जनता तक पहुंचाने में विश्वास करती है. उनके अनुसार, सत्ता का विकेंद्रीकरण ही लोकतंत्र की असली आत्मा है.
“आज्ञापालन नहीं, सहभागिता चाहिए”
राहुल गांधी ने कहा कि कुछ राजनीतिक शक्तियां जनता से सवाल पूछने के बजाय केवल आज्ञापालन चाहती हैं. वे जनता की आवाज सुनने में रुचि नहीं रखतीं. हालांकि उन्होंने किसी का नाम नहीं लिया, लेकिन उनका संकेत उन लोगों की ओर था, जो सरकार से असहमति रखने के बावजूद डर के कारण खुलकर बोल नहीं पाते.
डर के माहौल पर अप्रत्यक्ष टिप्पणी
अपने भाषण के अंत में राहुल गांधी ने उन नागरिकों की ओर इशारा किया, जिन्हें यह आशंका रहती है कि अगर उन्होंने अपनी राय रखी तो उन्हें व्यक्तिगत या आर्थिक नुकसान झेलना पड़ सकता है. उन्होंने कहा कि डर के माहौल में लोकतंत्र जीवित नहीं रह सकता और इसे बदलने की जिम्मेदारी जनता की है.


