हाई कोर्ट के फैसले ने बदली राजस्थान की तस्वीर, जयपुर में अब गहलोत मॉडल पर चलेगी सरकार

अदालत ने सरकारी परियोजनाओं में टेंडर प्रक्रिया पर सख्त रुख अपनाते हुए कहा है कि बिना ठोस और कानूनी कारण के किसी भी चल रहे कॉन्ट्रैक्ट को रद्द करना पूरी तरह मनमाना और दुर्भावनापूर्ण है.

Nidhi Jha
Edited By: Nidhi Jha

राजस्थान: सरकारी परियोजनाओं में टेंडर प्रक्रिया को लेकर अदालतों ने एक बार फिर कड़ा रुख अपनाया है. एक महत्वपूर्ण मामले की सुनवाई करते हुए अदालत ने साफ शब्दों में कहा है कि किसी भी चालू या मौजूदा कॉन्ट्रैक्ट को बिना किसी ठोस और कानूनी वजह के रद्द करना पूरी तरह से मनमाना और दुर्भावनापूर्ण कदम है. अदालत ने चेतावनी दी है कि ऐसे फैसलों से न केवल परियोजना की लागत में भारी बढ़ोतरी होती है बल्कि जनता के टैक्स के पैसे और सार्वजनिक संसाधनों की भी भारी बर्बादी होती है.

कोर्ट ने क्या आदेश दिया

इस पूरे मामले की गंभीरता को देखते हुए अदालत ने राज्य के मुख्य सचिव को सीधे तौर पर जांच की कमान सौंपी है. कोर्ट ने आदेश दिया है कि मुख्य सचिव अगले दो महीनों के भीतर इस पूरी निर्णय प्रक्रिया की बारीकी से जांच करें और अपनी रिपोर्ट सौंपें.

कोर्ट की सख्त टिप्पणी

मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने अधिकारियों के काम करने के तरीकों  पर गंभीर सवाल उठाए. कोर्ट का मानना है कि किसी भी प्रोजेक्ट की नई परियोजना रिपोर्ट तैयार करने के लिए दोबारा टेंडर जारी करने का फैसला प्रशासनिक विफलता और नियमों की अनदेखी को दर्शाता है. जब एक बार अनुबंध फाइनल हो चुका हो तो उसे बीच में रोककर नए सिरे से प्रक्रिया शुरू करने का कोई मतलब नहीं बनता. इससे प्रोजेक्ट्स सालों-साल लटके रहते हैं जिसका सीधा नुकसान आम जनता को भुगतना पड़ता है.

मुख्य सचिव करेंगे जिम्मेदारों की पहचान

अदालत ने सिर्फ जांच के आदेश ही नहीं दिए हैं बल्कि सख्त कार्रवाई की रूपरेखा भी तय कर दी है. मुख्य सचिव को दिए गए निर्देशों के अनुसार यह देखा जाएगा कि मौजूदा अनुबंध को रद्द करने की फाइल किस स्तर पर आगे बढ़ी और इसके पीछे क्या तर्क दिए गए थे. इस मनमाने फैसले में शामिल रहे सभी संबंधित अधिकारियों और इंजीनियरों की पहचान की जाएगी. दोषी पाए जाने वाले अधिकारियों के खिलाफ सख्त प्रशासनिक और कानूनी कार्रवाई सुनिश्चित की जाएगी. ताकि भविष्य में इस तरह के निर्णयों पर रोक लग सके.

सार्वजनिक संसाधनों की सुरक्षा सर्वोपरि

इस ऐतिहासिक आदेश ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि प्रशासनिक अधिकारी अपनी मर्जी से सरकारी खजाने को नुकसान नहीं पहुंचा सकते. टेंडर प्रक्रियाओं में पारदर्शिता बनाए रखना और समय सीमा के भीतर काम पूरा करना हर विभाग की कानूनी जिम्मेदारी है. अब सभी की नजरें मुख्य सचिव की आगामी रिपोर्ट पर टिकी हैं. जो दो महीने के भीतर कोर्ट के सामने पेश की जानी है. इसके बाद ही यह साफ हो पाएगा कि इस लापरवाही के पीछे असल में कौन से चेहरे शामिल थे.

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