न्याय के लिए 'सत्याग्रह': AAP सुप्रीमो का बड़ा कदम, जज के सामने या वकील के ज़रिए पेश नहीं होंगे केजरीवाल

अरविंद केजरीवाल ने जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा की अदालत में पेश न होने का फैसला लिया है. उन्होंने सत्याग्रह का ऐलान करते हुए कहा कि इसकी वजह अब खुद बताएंगे. जिसके बाद से यह फैसला काफी चर्चा में है.

Goldi Rai
Edited By: Goldi Rai

दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और न्यायपालिका के बीच एक अभूतपूर्व स्थिति पैदा हो गई है, जिसे भारतीय न्यायिक इतिहास में दुर्लभ माना जा रहा है. केजरीवाल ने जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा की बेंच के समक्ष चल रही कार्यवाही में हिस्सा न लेने का फैसला किया है, जिससे संवैधानिक बहस तेज हो गई है.

यह फैसला उस समय सामने आया जब 20 अप्रैल 2026 को कोर्ट ने उनकी ‘रिक्यूज़ल’ याचिका को खारिज कर दिया था. केजरीवाल का कहना है कि उनके मन में न्याय की निष्पक्षता को लेकर जो "गहरी आशंकाएं" थीं, वे अदालत के आदेश के बाद भी समाप्त नहीं हुई हैं.

‘सत्याग्रह’ के रूप में पेश की जा रही लड़ाई

अरविंद केजरीवाल इस पूरे मामले को कानूनी संघर्ष के बजाय ‘सत्याग्रह’ के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं. उन्होंने महातमा गांधी के सिद्धांतों का हवाला देते हुए कहा कि जब किसी नागरिक को व्यवस्था में अन्याय महसूस होता है, तो उसका पहला कर्तव्य विरोध या अहंकार दिखाना नहीं, बल्कि संवाद स्थापित करना होता है.

उन्होंने कहा कि उन्होंने अदालत के सामने विनम्रता से अपनी बात रखी, लेकिन जब उनकी अंतरात्मा को संतोष नहीं मिला, तो उन्होंने सत्याग्रह का रास्ता चुना. केजरीवाल इसे किसी व्यक्ति या संस्था के खिलाफ नहीं, बल्कि एक नागरिक की विवेक की पुकार बता रहे हैं.

न्यायिक निष्पक्षता पर बड़ा सवाल

अपने पत्र के माध्यम से केजरीवाल ने एक गंभीर मुद्दा उठाया है. उन्होंने कहा कि पिछले 75 वर्षों में जब भी लोकतंत्र के अन्य स्तंभ कमजोर हुए हैं, तब जनता ने न्यायपालिका पर भरोसा जताया है. उनका कहना है कि यह कदम न्यायपालिका को कमजोर करने के लिए नहीं, बल्कि उसे और अधिक मजबूत और विश्वसनीय बनाने के उद्देश्य से उठाया गया है. उन्होंने यह भी संकेत दिया कि यदि एक पूर्व मुख्यमंत्री को ही किसी विशेष बेंच से न्याय मिलने को लेकर संदेह है, तो यह आम नागरिकों के लिए भी चिंता का विषय हो सकता है.

कानून का सम्मान और संवैधानिक विकल्प

हालांकि केजरीवाल ने इस बेंच से दूरी बना ली है, लेकिन उन्होंने स्पष्ट किया है कि वह कानून का उल्लंघन नहीं कर रहे हैं. उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में अपील करने के अपने संवैधानिक अधिकार का उल्लेख करते हुए कहा कि इसके लिए उन्हें 90 दिनों की समयसीमा प्राप्त है.

‘न्यायिक सत्याग्रह’ पर राजनीतिक हलचल

राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, केजरीवाल का यह ‘न्यायिक सत्याग्रह’ आने वाले समय में कानूनी और राजनीतिक दोनों क्षेत्रों में चर्चा का विषय बना रहेगा. इसे एक ऐसे कदम के रूप में देखा जा रहा है, जो न्यायिक शुचिता और पारदर्शिता पर व्यापक बहस को जन्म दे सकता है.

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