हिंदू मैरिज एक्ट की धारा को चुनौती देने पहुंचा छात्र, सुप्रीम कोर्ट ने लगाई फटकार, CJI बोले- PIL से निजी बदला नहीं ले सकते
हिंदू विवाह अधिनियम को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई के दौरान कोर्ट ने याचिकाकर्ता को जमकर फटकार लगाई. कोर्ट की इस टिप्पणी के बाद मामले ने नया मोड़ ले लिया.

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को हिंदू विवाह अधिनियम की एक धारा को चुनौती देने वाली जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता को कड़ी फटकार लगाई. मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने साफ कहा कि जनहित याचिका का इस्तेमाल निजी विवाद या बदला निकालने के लिए नहीं किया जा सकता. कोर्ट ने याचिकाकर्ता छात्र को जुर्माना लगाने तक की चेतावनी दे डाली.
दरअसल, लॉ के छात्र जितेंद्र सिंह ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर हिंदू मैरिज एक्ट, 1955 की धारा 13(2)(iii) की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी थी. इस प्रावधान के तहत पत्नी को विशेष परिस्थितियों में तलाक मांगने का अधिकार दिया गया है. छात्र ने दलील दी थी कि इस कानून को जेंडर न्यूट्रल बनाया जाना चाहिए और पुरुषों को भी समान अधिकार मिलने चाहिए.
किस प्रावधान को दी गई चुनौती?
याचिका में हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13(2)(iii) को चुनौती दी गई थी. यह धारा पत्नी को यह अधिकार देती है कि यदि पति के खिलाफ गुजारा भत्ता का आदेश पारित होने के बाद एक वर्ष या उससे अधिक समय तक दोनों साथ नहीं रहते हैं, तो पत्नी तलाक की अर्जी दाखिल कर सकती है.
याचिकाकर्ता का कहना था कि यह प्रावधान केवल महिलाओं को विशेष अधिकार देता है, जबकि पुरुषों को ऐसा अधिकार नहीं मिला है. इसलिए इसे संविधान के समानता के सिद्धांत के अनुरूप जेंडर न्यूट्रल बनाया जाना चाहिए.
सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई से किया इनकार
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और जस्टिस जोयमाल्य बागची की पीठ ने इस मामले में सुनवाई करने से इनकार कर दिया. सुनवाई के दौरान CJI ने याचिकाकर्ता से पूछा, आप इस प्रावधान से व्यक्तिगत रूप से कैसे प्रभावित हैं? क्या आपको लगता है कि पूरे पुरुष वर्ग का प्रतिनिधित्व सिर्फ आप ही करते हैं? कोर्ट के सवाल पर छात्र ने स्वीकार किया कि वह पिछले 7-8 वर्षों से वैवाहिक मुकदमेबाजी का सामना कर रहा है.
आप PIL के जरिए निजी बदला लेना चाहते हैं
याचिकाकर्ता के जवाब पर CJI सूर्यकांत ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा, आप इस PIL के जरिए अपना निजी बदला लेना चाहते हैं. यही मैं आपसे कबूल करवाना चाहता था. उन्होंने आगे कहा, हम आप पर जुर्माना क्यों न लगाएं? मुझे उम्मीद है कि आप कानून की पढ़ाई सिर्फ इसी उद्देश्य से नहीं कर रहे हैं.
महिलाओं और बच्चों के लिए विशेष कानून बनाने का अधिकार
सुनवाई के दौरान जस्टिस जोयमाल्य बागची ने भी स्पष्ट किया कि संविधान सरकार को महिलाओं और बच्चों के लिए विशेष प्रावधान बनाने का अधिकार देता है. उन्होंने कहा, अगर आप पूरी तरह समानता चाहते हैं, तो इसके लिए संविधान में संशोधन करवाना होगा. यह एक विशेष कानून है.
अदालत ने PIL के दुरुपयोग पर जताई चिंता
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी को जनहित याचिकाओं के दुरुपयोग पर एक कड़ा संदेश माना जा रहा है. अदालत ने संकेत दिया कि व्यक्तिगत विवादों को सार्वजनिक हित का रूप देकर अदालत का समय बर्बाद नहीं किया जा सकता.


