जनआंदोलन से बिखरे विरोध तक: ट्रेड यूनियन आंदोलन का बदलता चेहरा

12 फरवरी के भारत बंद ने देश में ट्रेड यूनियनों की वास्तविक ताकत पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए। दावों और जमीनी असर के बीच अंतर ने बदलते श्रम बाजार, असंगठित रोजगार और आर्थिक प्राथमिकताओं की नई तस्वीर सामने रख दी। Kamal Madishetty Assistant Professor Rishihood University, Haryana.

Lalit Sharma
Edited By: Lalit Sharma

12 फरवरी को केंद्रीय ट्रेड यूनियनों के संयुक्त मंच द्वारा बुलाया गया “भारत बंद” एक राष्ट्रव्यापी शक्ति प्रदर्शन के रूप में पेश किया गया था। इसे संगठित मजदूर वर्ग की एकजुटता और प्रभाव का प्रमाण बताया गया। लेकिन जमीनी तस्वीर ने एक अलग कहानी कही। कई राज्यों से मिली रिपोर्टों में सामान्य जनजीवन लगभग सामान्य रहा। अधिकांश शहरों में बाजार खुले रहे, सार्वजनिक परिवहन चलता रहा और औद्योगिक गतिविधियां केवल कुछ स्थानों पर प्रभावित हुईं। इस अंतर ने यह संकेत दिया कि राष्ट्रीय स्तर पर आहूत यह हड़ताल अपने घोषित उद्देश्य से काफी पीछे रह गई।

भारत बंद की वास्तविक तस्वीर

यूनियन नेताओं ने व्यापक भागीदारी का दावा किया, किंतु अनेक औद्योगिक क्षेत्रों में भी उपस्थिति आंशिक रही। कुछ इलाकों में जहां यूनियनों की राजनीतिक पकड़ मजबूत है, वहां असर दिखा, परंतु देश के बड़े हिस्से में जीवन सामान्य रहा। “भारत बंद” जैसी व्यापक शब्दावली और वास्तविक प्रभाव के बीच यह अंतर ट्रेड यूनियन आंदोलन की घटती पकड़ को उजागर करता है। कई बाजारों में दुकानों के शटर सामान्य दिनों की तरह खुले रहे और दफ्तरों में कर्मचारियों की उपस्थिति दर्ज हुई। इससे यह संकेत मिला कि आह्वान और वास्तविक जनसमर्थन के बीच एक स्पष्ट दूरी मौजूद है।

असंगठित श्रम का दबदबा

भारत का श्रम बाजार लंबे समय से असंगठित क्षेत्र पर आधारित रहा है। आज भी लगभग 85-90 प्रतिशत श्रमिक अनौपचारिक रोजगार में हैं, जहां स्थायित्व और सामाजिक सुरक्षा का अभाव है। हालिया सर्वेक्षणों के अनुसार बड़ी संख्या में लोग स्व-रोजगार में हैं, न कि नियमित वेतनभोगी कर्मचारी। ऐसे परिदृश्य में पारंपरिक यूनियन मॉडल, जो बड़े कारखानों और स्थायी नौकरियों पर आधारित था, सीमित प्रभाव ही डाल सकता है। छोटे दुकानदार, रेहड़ी-पटरी वाले और घरेलू कामगार इस ढांचे से लगभग बाहर हैं। उनकी प्राथमिकता रोज की आय सुनिश्चित करना है, न कि सामूहिक हड़ताल में शामिल होना।

बदलती रोजगार संरचना

सेवा क्षेत्र, छोटे उद्यम, संविदा व्यवस्था और गिग अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ रहे हैं। डिलीवरी पार्टनर, फ्रीलांसर या छोटे व्यापारी जैसे वर्ग पारंपरिक हड़ताल की रणनीति से स्वयं को जुड़ा हुआ महसूस नहीं करते। उनके लिए एक दिन का काम छोड़ना सीधा आर्थिक नुकसान है। ऐसे में केंद्रीकृत हड़ताल उनकी रोजमर्रा की जरूरतों से मेल नहीं खाती। डिजिटल प्लेटफॉर्म आधारित काम में लचीलापन तो है, पर सुरक्षा कम है। ऐसे श्रमिक अस्थिर आय के कारण जोखिम उठाने से बचते हैं।

क्षेत्रीय प्रभाव और विवाद

12 फरवरी के बंद ने इस दूरी को उजागर कर दिया। केरल में बंद लगभग पूर्ण रहा, लेकिन वहां भी जबरन लागू करने के आरोप और सार्वजनिक आलोचना सामने आई। पश्चिमी और उत्तरी भारत के कई हिस्सों में असर सीमित रहा। कुछ जगहों पर सड़क और रेल रोकने की घटनाएं रिपोर्ट हुईं, जो स्वैच्छिक भागीदारी से अधिक प्रतीकात्मक अवरोध जैसी दिखीं। कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए कई स्थानों पर एहतियाती हिरासतें भी हुईं। इन घटनाओं ने आंदोलन की स्वैच्छिक प्रकृति पर सवाल खड़े किए।

आम नागरिकों पर असर

सामान्य नागरिकों के लिए ऐसी हड़तालें अक्सर असुविधा और आर्थिक हानि का कारण बनती हैं। यात्रियों को परेशानी होती है, छोटे व्यवसाय एक दिन की कमाई खो देते हैं और दैनिक वेतनभोगी मजदूरों की आय प्रभावित होती है। अस्पताल, परीक्षाएं और जरूरी सेवाएं बाधित होती हैं। जो कभी लोकतांत्रिक विरोध का प्रभावी माध्यम था, वह अब कई लोगों को थोपे गए अवरोध जैसा लगता है। स्कूल और कॉलेजों में उपस्थिति घट जाती है और अभिभावक असमंजस में रहते हैं। सार्वजनिक जीवन में अनिश्चितता का माहौल बनता है, जो समर्थन के बजाय असंतोष पैदा करता है।

यूनियनों और जनता के बीच दूरी

रोजगार संरचना के तेज बदलाव के साथ यूनियन रणनीतियां उतनी तेजी से नहीं बदलीं। नेतृत्व अभी भी पारंपरिक क्षेत्रों और सार्वजनिक उपक्रमों में केंद्रित है। हड़ताल की मांगें अक्सर निजीकरण या सुधारों के विरोध तक सीमित रहती हैं, जबकि व्यावहारिक विकल्प कम ही सामने आते हैं। इससे यह धारणा बनती है कि आंदोलन परिवर्तन के विरोध में है, न कि रचनात्मक संवाद के पक्ष में। युवा कार्यबल की आकांक्षाएं कौशल और अवसर से जुड़ी हैं। यदि संवाद का स्वर समावेशी न हो, तो जुड़ाव और भी कम होता जाता है।

वैश्विक आर्थिक परिप्रेक्ष्य

यह स्थिति ऐसे समय में सामने आई है जब वैश्विक व्यापार व्यवस्था अनिश्चितताओं से गुजर रही है। संरक्षणवाद बढ़ रहा है और आपूर्ति शृंखलाएं पुनर्गठित हो रही हैं। भारत ने हाल के वर्षों में कई मुक्त व्यापार समझौते किए हैं और स्वयं को एक विश्वसनीय विनिर्माण व सेवा भागीदार के रूप में स्थापित करने का प्रयास किया है। ऐसे दौर में औद्योगिक अवसर को गंवाना देश के लिए भारी पड़ सकता है। विश्व अर्थव्यवस्था में प्रतिस्पर्धा तेज हो रही है और निवेश के लिए देशों में होड़ है। ऐसे में स्थिर श्रम संबंध भारत की विश्वसनीयता को मजबूत कर सकते हैं।

सुधार और श्रमिक हित

इसका अर्थ यह नहीं कि श्रमिक संगठन अप्रासंगिक हो गए हैं। “मेक इन इंडिया” जैसी पहलों और वैश्विक मूल्य शृंखलाओं में एकीकरण के साथ श्रमिक कल्याण, कौशल विकास, उत्पादकता और सामाजिक सुरक्षा और भी महत्वपूर्ण हो जाते हैं। आधुनिक अर्थव्यवस्था में वैधता केवल गतिविधियां रोकने की क्षमता से नहीं, बल्कि जिम्मेदार सुधारों को दिशा देने की क्षमता से मिलती है। यदि यूनियनें कौशल उन्नयन और सामाजिक सुरक्षा पर ठोस प्रस्ताव रखें, तो उनकी साख बढ़ सकती है। साझेदारी का मॉडल टकराव की राजनीति से अधिक प्रभावी साबित हो सकता है।

चौराहे पर खड़ा आंदोलन

आज ट्रेड यूनियन आंदोलन एक निर्णायक मोड़ पर है। वह या तो भविष्य की ओर देखने वाला दृष्टिकोण अपनाकर राष्ट्रीय विकास का सहभागी बन सकता है, या फिर प्रतीकात्मक बंद तक सीमित रह सकता है। यदि श्रमिक सम्मान और आर्थिक प्रगति के बीच संतुलन स्थापित करना है, तो सहयोगात्मक और व्यावहारिक रणनीति अपनाना अनिवार्य है। भारत की आर्थिक यात्रा के इस महत्वपूर्ण चरण में यही रास्ता श्रमिक हित और राष्ट्रीय उन्नति को साथ ला सकता है। समय की मांग है कि आंदोलन अपनी भाषा और तरीके दोनों में बदलाव लाए।
तभी वह बदलते भारत में प्रासंगिक और प्रभावशाली भूमिका निभा सकेगा।
                                      Kamal Madishetty Assistant Professor Rishihood University, Haryana.

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