यूजीसी नियमों पर भाजपा में घमासान, विजेंदर सिंह, योगेश्वर दत्त और कलराज मिश्रा ने ही सरकार को कठघरे में किया खड़ा

यूजीसी के नए नियमों को लेकर अब विवाद सड़क से सत्ता तक पहुंच गया है। खास बात यह है कि विरोध विपक्ष नहीं बल्कि भाजपा के भीतर से उठने लगा है।

Lalit Sharma
Edited By: Lalit Sharma

यूजीसी के नए नियमों को लेकर अब भाजपा के भीतर असहजता साफ दिखने लगी है। लंबे समय तक खामोश रही पार्टी में अब दिग्गज नेता खुलकर सवाल उठा रहे हैं। पूर्व राज्यपाल कलराज मिश्र ने इन नियमों को असंवैधानिक बताया। उन्होंने साफ कहा कि नियमों को वापस लिया जाना चाहिए। उनका कहना है कि भेदभाव के खिलाफ अधिकार सभी को मिलने चाहिए। केवल जाति के आधार पर शिकायत का दायरा सीमित करना गलत है। इस बयान के बाद सियासी हलकों में हलचल तेज हो गई। भाजपा के अंदर उठती यह आवाज मामूली नहीं मानी जा रही।

कलराज मिश्र ने क्यों उठाए सवाल?

कलराज मिश्र ने कहा कि 2012 की गाइडलाइन में संतुलन था। उस समय एससी और एसटी के लिए शिकायत का प्रावधान था। अब ओबीसी को जोड़ दिया गया है। लेकिन समस्या यह है कि बाकी वर्गों को बाहर कर दिया गया। उन्होंने कहा कि न्याय का अधिकार सभी का होना चाहिए। अगर किसी के साथ भेदभाव हो रहा है तो वह शिकायत कर सके। उन्होंने झूठी शिकायतों पर सजा का भी सवाल उठाया। अभी नियमों में इसका कोई प्रावधान नहीं है। यही बात नियमों को कमजोर बनाती है।

सिर्फ बाहर नहीं भीतर भी विरोध?

अब तक यूजीसी नियमों के खिलाफ विरोध को बाहरी दबाव माना जा रहा था। लेकिन भाजपा के भीतर से बयान आने के बाद तस्वीर बदल गई है। पार्टी के वरिष्ठ नेता खुलकर बोल रहे हैं। यह संकेत है कि असंतोष गहराता जा रहा है। अंदरखाने यह मुद्दा असहजता पैदा कर रहा है। कई नेता सार्वजनिक मंच से अपनी बात रख रहे हैं। इससे साफ है कि मामला केवल छात्र संगठनों तक सीमित नहीं रहा। अब यह राजनीतिक चुनौती बन चुका है।

हरियाणा में क्यों भड़का आक्रोश?

हरियाणा में इस मुद्दे पर विरोध सबसे तेज नजर आ रहा है। ओलिंपियन रेसलर और भाजपा नेता योगेश्वर दत्त ने लगातार पोस्ट किए। उन्होंने इसे बच्चों के भविष्य से जोड़कर देखा। उनका कहना है कि शिक्षा बराबरी का माध्यम होनी चाहिए। समाज को बांटने का औजार नहीं बनना चाहिए। उन्होंने चुप्पी को भी अपराध बताया। उनका यह रुख पार्टी लाइन से अलग दिखा। इससे पार्टी नेतृत्व की परेशानी बढ़ी है।

विजेंदर सिंह का सीधा संदेश क्या?

ओलिंपियन बॉक्सर विजेंदर सिंह ने भी खुलकर विरोध किया। उन्होंने कहा कि शिक्षा का मकसद समान अवसर देना है। समाज में नई दीवारें खड़ी करना गलत है। उनका बयान संक्षिप्त था लेकिन असरदार रहा। भाजपा के भीतर यह एक और असहज संकेत था। खेल जगत से आए नेताओं की चिंता अलग वजन रखती है। उनका सीधा संवाद युवाओं से जुड़ता है। यही बात इस विरोध को मजबूत बनाती है।

जमीनी स्तर पर क्या असर पड़ा?

यूजीसी नियमों का असर अब जमीन पर दिखने लगा है। झज्जर में महिला मोर्चा की नेता ने इस्तीफा दे दिया। यमुनानगर में प्रदर्शन हुए। विधायकों के घरों के बाहर धार्मिक पाठ किए गए। ज्ञापन सौंपे गए। यह साफ संकेत है कि दबाव बढ़ रहा है। पार्टी के जनप्रतिनिधियों से जवाब मांगा जा रहा है। अंदरूनी असंतोष अब सार्वजनिक हो चुका है।

आगे भाजपा के लिए चुनौती?

अब सवाल यह है कि भाजपा इस स्थिति से कैसे निपटेगी। एक तरफ सरकार है और दूसरी तरफ पार्टी के अपने नेता। अगर आवाजें और बढ़ीं तो फैसला लेना मुश्किल होगा। यूजीसी नियम शिक्षा से जुड़े हैं। इसलिए असर भी दूर तक जाएगा। भाजपा के भीतर उठी यह चिंगारी बड़ा रूप ले सकती है। आने वाले दिनों में और बयान सामने आ सकते हैं। यही कारण है कि यह मुद्दा अब बेहद संवेदनशील हो गया है।

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