युद्ध की धमकी या डील का दबाव-ईरान पर ट्रंप की सख्त भाषा ने दुनिया को चिंतित किया
अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने ईरान को फिर चेताया है। सवाल यह नहीं कि हमला होगा या नहीं, सवाल यह है कि डर दिखाकर डील क्यों कराई जा रही है।

ईरान को लेकर ट्रंप का बयान सामान्य कूटनीतिक भाषा नहीं है। यह सीधे डर पैदा करने वाली भाषा है। “आर्मडा आगे बढ़ रहा है” कहना किसी संवाद की शुरुआत नहीं करता। यह दबाव बनाता है। यह संदेश देता है कि बात नहीं मानी तो हमला तय है। सवाल उठता है कि क्या अमेरिका अब बातचीत नहीं करता। क्या वह सिर्फ धमकी देता है। यह तरीका दुनिया को अस्थिर करता है। यही वजह है कि ट्रंप के शब्दों पर पूरी दुनिया नजर रखे हुए है।
डील या तबाही का विकल्प क्यों?
ट्रंप बार-बार कहते हैं कि ईरान डील करे। वरना अंजाम बुरा होगा। यह भाषा किसी समझौते की नहीं है। यह अल्टीमेटम है। कूटनीति में विकल्प होते हैं। यहां विकल्प नहीं हैं। यहां डर है। यह तरीका पहले भी देखा गया है। उत्तर कोरिया में भी यही हुआ। वेनेजुएला में भी यही हुआ। अब ईरान की बारी है। पैटर्न साफ है।
आर्मडा का जिक्र किसके लिए?
ट्रंप का बयान ईरान से ज्यादा दुनिया के लिए है। वह यह दिखाना चाहते हैं कि अमेरिका ताकतवर है। वह यह बताना चाहते हैं कि वह हमला कर सकते हैं। आर्मडा का नाम लेना मनोवैज्ञानिक दबाव है। इससे बाजार डरते हैं। सरकारें घबराती हैं। और बातचीत कमजोर स्थिति से होती है। यह रणनीति शांति नहीं लाती। यह तनाव बढ़ाती है।
क्या यह चुनावी भाषा है?
ट्रंप जब भी सख्त दिखते हैं, उनका घरेलू आधार मजबूत होता है। अमेरिका में यह संदेश जाता है कि राष्ट्रपति कमजोर नहीं है। यह बयान विदेश नीति से ज्यादा घरेलू राजनीति से जुड़ा दिखता है। युद्ध की भाषा अक्सर वोट की राजनीति में इस्तेमाल होती है। इससे राष्ट्रपति की छवि मजबूत बनाई जाती है। सवाल है कि क्या ईरान सिर्फ एक मंच है।
ईरान की चुप्पी क्या कहती है?
ईरान की तरफ से फिलहाल बातचीत का कोई संकेत नहीं है। वहां के विदेश मंत्री साफ कह चुके हैं कि कोई संपर्क नहीं हुआ। इसका मतलब है कि ट्रंप की धमकी ने अभी असर नहीं दिखाया। लेकिन इससे तनाव जरूर बढ़ा है। जब संवाद नहीं होता, तब गलतफहमी बढ़ती है। यही हालात युद्ध की जमीन तैयार करते हैं।
पुरानी डील से बाहर क्यों निकले थे?
ट्रंप ने अपने पहले कार्यकाल में ओबामा दौर की परमाणु डील को रद्द कर दिया था। तब कहा गया था कि डील खराब है। अब वही डील नए नाम से चाहिए। फर्क बस इतना है कि इस बार भाषा और ज्यादा सख्त है। सवाल उठता है कि क्या यह नीति की विफलता है। या फिर दबाव से जीतने की कोशिश।
दुनिया को इससे क्या सीख?
यह बयान सिर्फ ईरान तक सीमित नहीं है। यह दुनिया के लिए संकेत है। संकेत यह कि अमेरिकी विदेश नीति अब संतुलन नहीं देखती। वह ताकत दिखाती है। डर का इस्तेमाल करती है। यह रास्ता खतरनाक है। क्योंकि डर कभी स्थायी समाधान नहीं देता। सौरभ द्विवेदी की नजर में यह बयान युद्ध की तैयारी से ज्यादा सत्ता के अहंकार का प्रदर्शन है।


