निजी परिसर में प्रार्थना के लिए अनुमति जरूरी नहीं, इलाहाबाद हाईकोर्ट का अहम फैसला
निजी संपत्ति में धार्मिक प्रार्थना को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बड़ा और साफ फैसला दिया है. कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि शांतिपूर्ण प्रार्थना सभा के लिए प्रशासनिक अनुमति अनिवार्य नहीं है, क्योंकि यह संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत मौलिक अधिकार है.

प्रयागराज: उत्तर प्रदेश में धार्मिक स्वतंत्रता से जुड़े एक अहम मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बड़ा और स्पष्ट फैसला सुनाया है. कोर्ट ने कहा है कि किसी भी व्यक्ति या समुदाय को अपने निजी परिसर में धार्मिक प्रार्थना सभा आयोजित करने के लिए राज्य सरकार या प्रशासन से पूर्व अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है. यह अधिकार भारत के संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत प्रदत्त मौलिक अधिकारों का हिस्सा है.
हाईकोर्ट ने अपने निर्णय में साफ किया कि सामान्य परिस्थितियों में इस अधिकार को सीमित नहीं किया जा सकता. यदि धार्मिक गतिविधि पूरी तरह शांतिपूर्ण हो और निजी संपत्ति की सीमा में ही आयोजित की जा रही हो, तो प्रशासन की ओर से अनुमति की शर्त लगाना संविधान की भावना के खिलाफ होगा.
अनुच्छेद 25 के तहत धार्मिक स्वतंत्रता
कोर्ट ने अपने आदेश में संविधान के अनुच्छेद 25 का उल्लेख करते हुए कहा कि प्रत्येक नागरिक को अपने धर्म को मानने, उसका पालन करने और उसका प्रचार करने की स्वतंत्रता है.
जब कोई धार्मिक प्रार्थना सभा पूरी तरह निजी परिसर के भीतर और शांतिपूर्ण ढंग से आयोजित की जाती है, तो उसे कानून के नाम पर अनुमति लेने के लिए बाध्य करना उचित नहीं ठहराया जा सकता.
प्रशासनिक हस्तक्षेप पर कोर्ट की टिप्पणी
हाईकोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में प्रशासनिक हस्तक्षेप संविधान की मूल भावना के विपरीत होगा. निजी संपत्ति के भीतर होने वाली धार्मिक गतिविधि, यदि कानून-व्यवस्था या सार्वजनिक शांति को प्रभावित नहीं करती, तो उस पर रोक नहीं लगाई जा सकती.
निजी संपत्ति तक सीमित रहेगा यह अधिकार
हालांकि कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यह स्वतंत्रता केवल तभी मान्य होगी, जब धार्मिक प्रार्थना सभा पूरी तरह निजी परिसर के भीतर सीमित रहे.यदि किसी आयोजन का प्रभाव सार्वजनिक क्षेत्र तक पहुंचता है, या उससे सार्वजनिक व्यवस्था, शांति या यातायात प्रभावित होता है, तो प्रशासन को आवश्यक कदम उठाने का अधिकार होगा.
सार्वजनिक स्थानों के लिए अलग नियम
कोर्ट ने यह भी साफ किया कि सार्वजनिक स्थानों पर किसी भी प्रकार की धार्मिक सभा, आयोजन या जुलूस निकालने से पहले संबंधित पुलिस या प्रशासन को सूचना देना अनिवार्य है.सार्वजनिक स्थलों पर कानून-व्यवस्था बनाए रखना प्रशासन की जिम्मेदारी है, इसलिए ऐसे मामलों में नियमों का पालन जरूरी होगा.
क्या थी मामले की पृष्ठभूमि
यह फैसला एक याचिका की सुनवाई के दौरान आया, जिसमें निजी परिसर में प्रार्थना सभा करने पर प्रशासन की ओर से की गई आपत्ति को चुनौती दी गई थी.याचिकाकर्ता का तर्क था कि निजी संपत्ति में शांतिपूर्ण धार्मिक गतिविधि पर रोक लगाना मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है. कोर्ट ने इस दलील से सहमति जताते हुए प्रशासनिक कार्रवाई को अनुचित करार दिया.
भविष्य के लिए फैसले का महत्व
हाईकोर्ट का यह निर्णय धार्मिक स्वतंत्रता से जुड़े मामलों में एक महत्वपूर्ण नजीर माना जा रहा है. इस फैसले से यह स्पष्ट संदेश गया है कि संविधान द्वारा प्रदत्त अधिकारों का सम्मान किया जाना चाहिए, बशर्ते वे सार्वजनिक शांति और व्यवस्था को प्रभावित न करें.


