मेरी मां कौन है, मैं कहां से आया हूं? 7000 किमी की यात्रा कर जन्म देने वाली मां को ढूंढने भारत आया अर्जुन

डेनमार्क के दंपति लुई और रासमस अपने 9 साल के गोद लिए बेटे अर्जुन की जन्मदाता मां की तलाश में तेलंगाना के आदिलाबाद पहुंचे. आदिवासी गांवों में ग्रामीणों ने ढोल-नगाड़ों से गर्मजोशी से स्वागत किया. अर्जुन को 2016 में अस्पताल में छोड़ा गया था. दंपति एक सप्ताह रुककर जानकारी जुटाएंगे.

Yaspal Singh
Edited By: Yaspal Singh

तेलंगानाः तेलंगाना के आदिलाबाद जिले के शांत और दूर-दराज के गांवों में एक दिल छू लेने वाली कहानी चल रही है. डेनमार्क के दंपति लुई और रासमस अपने 9 साल के गोद लिए बेटे अर्जुन को जन्म देने वाली मां की तलाश में भारत आए हैं. हजारों मील की दूरी तय कर यह परिवार चिल्लातिगुडा, टेकिदिगुडा, चोरगांव, सुंगापुर और आसपास के कई आदिवासी गांवों में पहुंचा है.

ग्रामीणों का गर्मजोशी भरा स्वागत

जहां भी यह दंपति पहुंचे, ग्रामीणों ने उन्हें अजनबी की तरह नहीं, बल्कि परिवार के सदस्य की तरह अपनाया. ढोल-नगाड़ों के साथ स्वागत हुआ, फूलों की मालाएं पहनाई गईं और घरों में चाय-नाश्ते के साथ बातचीत हुई. आदिवासी समुदाय की यह सादगी और आतिथ्य ने लुई-रासमस को गहराई से प्रभावित किया. वे कहते हैं कि यहां की सादगी और प्यार ने उन्हें लगा कि अर्जुन की जड़ें कितनी मजबूत और सुंदर हैं.

अर्जुन की शुरुआत की कहानी

अर्जुन का जन्म 2016 में हुआ था. जब वह महज कुछ महीने का शिशु था, उसे आदिलाबाद के आरआईएमएस अस्पताल के बाहर छोड़ दिया गया. उसकी उंगलियों में जन्मजात विकृति थी. ऐसा माना जाता है कि उसके जैविक माता-पिता गरीबी, डर और असहायता के कारण उसे छोड़ गए. अस्पताल प्रशासन ने उसे एक अनाथालय में भेज दिया.

2018 में  जब अर्जुन दो साल का था, लुई और रासमस ने भारत की दत्तक ग्रहण प्रक्रिया के जरिए उसे गोद लिया. तब से वह डेनमार्क में बड़े हो रहा है, स्कूल, दोस्त, खेल और ढेर सारा प्यार मिल रहा है. लेकिन जैसे-जैसे वह बड़ा हुआ, उसके मन में सवाल उठने लगे मेरी असली मां कौन है? मैं कहां से आया हूं?

भावनाओं का सम्मान

अर्जुन की इस जिज्ञासा और भावनाओं को देखकर उसके दत्तक माता-पिता ने फैसला किया कि वे उसकी जड़ों की तलाश में मदद करेंगे. उन्होंने गोद लिए बच्चों के परिवार से जुड़ने में मदद करने वाली स्वयंसेवी संस्था 'एडॉप्ट राइट काउंसिल' से संपर्क किया. संस्था की निदेशक अधिवक्ता अंजली पवार ने बताया कि उद्देश्य अर्जुन को उसके दत्तक माता-पिता से अलग करना नहीं है. वह हमेशा उनके साथ रहेगा. बस उसे यह जानना है कि उसकी शुरुआत कहां से हुई, ताकि वह भावनात्मक रूप से मजबूत बने और जीवन में किसी कमी का एहसास न हो.

आगे की योजना

यह दंपति आदिलाबाद में करीब एक सप्ताह रुकेंगे. वे गांव-गांव घूमेंगे, लोगों से बात करेंगे और उपलब्ध जानकारी इकट्ठा करेंगे. उन्होंने वादा किया है कि कोई भी जानकारी गोपनीय और सम्मानजनक तरीके से रखी जाएगी. अगर जन्मदाता मां मिल जाती हैं, तो लुई-रासमस उन्हें आर्थिक मदद देंगे और परिवार के बीच संपर्क बनाए रखेंगे. उनका मकसद दोनों दुनिया के बीच प्यार और विश्वास का पुल बनाना है.

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