महिला आरक्षण के बाद लोकसभा में पुरुष सांसदों की संख्या बढ़ेगी या घटेगी? जानिए पूरा समीकरण
हाल ही में मोदी सरकार द्वारा संसद में तीन महत्वपूर्ण विधेयक पेश किए गए हैं, जिसमें सबसे ज्यादा चर्चा का विषय बना है नारी शक्ति वंदन अधिनियम. इसके तहत महिलाओं को 3 प्रतिशत आरक्षण मिलेगा.

नई दिल्ली: मोदी सरकार ने हाल ही में संसद में तीन महत्वपूर्ण विधेयक पेश किए हैं. इनमें नारी शक्ति वंदन अधिनियम को 2029 के लोकसभा चुनाव से लागू करने के लिए संशोधन, परिसीमन की प्रक्रिया और लोकसभा सीटों की संख्या बढ़ाने का प्रस्ताव शामिल है.
कई लोग सोच रहे हैं कि महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण मिलने से पुरुष सांसदों की संख्या कम हो जाएगी, लेकिन हकीकत इसके उलट है. सीटों के बढ़ने से पुरुषों की संख्या भी पहले से ज्यादा हो जाएगी.
वर्तमान स्थिति क्या है?
अभी लोकसभा में कुल 543 सीटें हैं. इनमें करीब 74-78 महिला सांसद हैं, यानी लगभग 13-14 प्रतिशत. बाकी 86 प्रतिशत से ज्यादा पुरुष सांसद हैं. बिना आरक्षण के महिलाएं खुली सीटों पर लड़ती हैं, जिससे कभी-कभी पुरुष उम्मीदवारों को जगह कम पड़ जाती है.
सीटें बढ़ने का प्रस्ताव
सरकार लोकसभा की सीटें 543 से बढ़ाकर लगभग 816-850 करने का प्लान लाई है. इसमें परिसीमन के बाद नए क्षेत्रों को ध्यान में रखा जाएगा. बढ़ी हुई सीटों पर 33 प्रतिशत यानी करीब 270-283 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी. बाकी 550 से ज्यादा सीटें सामान्य रहेंगी, जहां पुरुष या महिला दोनों लड़ सकते हैं.
महिलाओं की संख्या बढ़ेगी
आरक्षण लागू होने पर लोकसभा में महिला सांसदों की संख्या एकदम बढ़कर 270 के पार पहुंच जाएगी, लेकिन पुरुष सांसदों की चिंता बेकार है. कुल सीटों के बढ़ने से सामान्य सीटों की संख्या भी काफी बढ़ जाएगी. उदाहरण के लिए, अगर कुल सीटें 850 हो जाती हैं तो महिलाओं के लिए 283 सीटें रिजर्व होंगी.
बची हुई 567 सीटों पर ज्यादातर पुरुष उम्मीदवार ही टिकट पाएंगे, क्योंकि पार्टियां रिजर्व सीटों पर महिलाओं को प्राथमिकता देंगी. इस तरह पुरुष सांसदों की संख्या मौजूदा 466 से बढ़कर 550-570 के आसपास पहुंच सकती है.
क्यों नहीं घटेगी पुरुषों की संख्या?
आरक्षण सिर्फ महिलाओं के लिए अतिरिक्त जगह नहीं छीन रहा, बल्कि कुल जगह बढ़ा रहा है. सामान्य सीटों पर पुरुषों का दबदबा बना रहेगा. महिलाएं ज्यादातर रिजर्व सीटों पर ही चुनाव लड़ेंगी, जिससे पुरुषों की मौजूदा सीटों पर असर कम पड़ेगा. यह ‘विन-विन’ स्थिति है कि महिलाओं की भागीदारी बढ़ेगी और पुरुषों की संख्या भी पहले से ज्यादा हो जाएगी.
इतिहास से सबक
1952 में पहली लोकसभा में सिर्फ 5 प्रतिशत महिलाएं थी (22 सांसद). 2024 तक यह बढ़कर 13-14 प्रतिशत हो गया. अब आरक्षण से यह 33 प्रतिशत तक पहुंच जाएगा. साथ ही संसद का आकार बड़ा होने से कुल प्रतिनिधित्व मजबूत होगा.


