लद्दाख में बनेगी दुनिया की सबसे ऊंची सुरंग, सीमाएं होंगी और मजबूत

भारत सीमावर्ती इलाकों में रणनीतिक सुरंगों का नेटवर्क तेजी से विकसित कर रहा है. लद्दाख में 15,800 फीट की ऊंचाई पर बनने वाली शिंकु ला सुरंग दुनिया की सबसे ऊंची सुरंग होगी, जो सीमा सुरक्षा और ऑल वेदर कनेक्टिविटी दोनों को नई मजबूती देगी.

Yogita Pandey
Edited By: Yogita Pandey

नई दिल्ली: भारत अपनी सीमाओं को हर मौसम में सुरक्षित और मजबूत बनाने की दिशा में निर्णायक कदम उठा रहा है. केंद्र सरकार रणनीतिक सुरंगों का ऐसा नेटवर्क तैयार कर रही है, जो न केवल सीमावर्ती इलाकों में सैन्य क्षमता को बढ़ाएगा, बल्कि दुर्गम पहाड़ी क्षेत्रों में सालभर सड़क संपर्क भी सुनिश्चित करेगा.

जम्मू-कश्मीर से लेकर पूर्वोत्तर और पश्चिमी घाट तक कई महत्वाकांक्षी सुरंग परियोजनाओं पर तेजी से काम आगे बढ़ाया जा रहा है. इन परियोजनाओं का उद्देश्य सीमाओं को अभेद्य बनाना, सेना की आवाजाही को सुगम करना और सामाजिक-आर्थिक विकास को गति देना है.

लद्दाख को मिलेगा तीसरा ऑल वेदर रूट

सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि सरकार ने छह लंबित डिटेल प्रोजेक्ट रिपोर्ट (डीपीआर) को फास्ट ट्रैक पर लाने के निर्देश दिए हैं. मौजूदा परियोजनाओं में सबसे अहम शिंकु ला सुरंग (4.1 किलोमीटर) है.

लगभग 15,800 फीट की ऊंचाई पर बनने वाली यह सुरंग दुनिया की सबसे ऊंची सुरंग होगी. यह लद्दाख को निम्मू-पदम-दारचा मार्ग के जरिए तीसरा वैकल्पिक ऑल वेदर कनेक्शन प्रदान करेगी. सीमा से सुरक्षित दूरी पर स्थित यह मार्ग सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है. सुरंग की शुरुआती खुदाई (प्री-कंस्ट्रक्शन) इस वर्ष मध्य तक शुरू करने का लक्ष्य रखा गया है.

पूर्वोत्तर में सुरंगों से सेना की ताकत बढ़ेगी

अरुणाचल प्रदेश के तवांग सेक्टर में बनने वाली स्मल्दर सुरंग सेना के लिए गेम चेंजर साबित हो सकती है. यह सुरंग भारी तोपखाने और मिसाइल सिस्टम को सैटेलाइट निगरानी से बचाते हुए वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) तक पहुंचाने में मदद करेगी. इसका रूट तय हो चुका है और वर्ष 2027 तक निर्माण कार्य शुरू होने की संभावना है.

मणिपुर की मोरहे-थुइबुल सुरंग भी सामरिक और व्यापारिक दृष्टि से अहम मानी जा रही है. यह परियोजना भारत की ‘लुक ईस्ट’ नीति और एशियन हाईवे प्रोजेक्ट का महत्वपूर्ण हिस्सा है. इससे पूर्वोत्तर में सेना की आवाजाही सुगम होगी और दक्षिण-पूर्व एशिया के साथ व्यापारिक मार्ग भी छोटा होगा.

मंत्रालय ने नेचिपु सुरंग के आगे तवांग सेक्टर में 2-3 छोटी सुरंगों की डीपीआर भी तैयार करनी शुरू कर दी है, ताकि एलएसी तक सैन्य उपकरणों की तेज और सुरक्षित पहुंच सुनिश्चित की जा सके.

महाराष्ट्र और केरल में भी सुरंग परियोजनाएं

सरकार की सुरंग योजना केवल हिमालयी क्षेत्रों तक सीमित नहीं है. महाराष्ट्र में खमशेत-कासरघाट सुरंग परियोजना पश्चिमी घाट में ट्रैफिक सुचारू करने के लिए तैयार की जा रही है. मुंबई-पुणे और मुंबई-गोवा मार्ग पर घाट वाले हिस्सों को खत्म कर यात्रा को तेज और सुरक्षित बनाने की योजना है.

दक्षिण भारत में नीलगिरी सब-वे सुरंग परियोजना क्षेत्र के लिए अहम साबित हो सकती है. केरल के वायनाड और मलप्पुरम के बीच कनेक्टिविटी बढ़ाने के लिए पर्यावरण अनुकूल सुरंग की योजना बनाई जा रही है. इसे इको-सेंसिटिव डिजाइन के तहत विकसित किया जाएगा, ताकि हाथियों के गलियारों को कोई नुकसान न पहुंचे.

सिंथन टॉप ट्विन सुरंग

जम्मू-कश्मीर में अनंतनाग और किश्तवाड़ को जोड़ने वाली ट्विन सुरंग सिंथन टॉप की डीपीआर अंतिम चरण में पहुंच चुकी है. लगभग 10-12 किलोमीटर लंबी यह सुरंग सर्दियों में भारी बर्फबारी के दौरान भी जम्मू और कश्मीर घाटी के बीच वैकल्पिक संपर्क सुनिश्चित करेगी.

वर्तमान में सर्दियों में सिंथन टॉप दर्रा बंद हो जाता है, जिससे आवाजाही प्रभावित होती है. प्रस्तावित सुरंग इस समस्या का स्थायी समाधान बन सकती है.

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