सऊदी संग खड़ा पाकिस्तान, अब यूएई ने कर्ज पर दिखाया सख्त रुख

पाकिस्तान ने सोचा था खाड़ी की दोस्ती काम आएगी। लेकिन यूएई ने दो टूक जवाब दिया. इसमें उसने दो अरब डॉलर का कर्ज टालने की मांग ठुकरा दी है. अब इस्लामाबाद पर दबाव बढ़ गया है।

Lalit Sharma
Edited By: Lalit Sharma

नई दिल्ली. आर्थिक स्थिति को लेकर इस समय पाकिस्तान के पापड़ बिक चुके हैं.मतलब आर्थिक तंगी के कारण हमारा पड़ोसी मुलक हाय-हाय कर रहा है. डालर की कमी औऱ महंगाई की ऊंची दर ने उसकी गहरे से चूलें हिला दी हैं. ऐसे में उसको चिंता सता रही है कि वह पुराने कर्ज किस तरह चुकाएगा. इसी के तह उसने यूएई से कहा कि दो अरब डॉलर का कर्ज दो साल आगे बढ़ा दें। लेकिन यूएई ने उसकी ये गुजारिश मानने से इंकार कर दिया है.यूएई ने साफ कहा कि तय समय पर पैसा लौटाना ही होगा.यह फैसला ऐसे वक्त आया जब पाकिस्तान खुलकर सऊदी अरब के साथ खड़ा दिख रहा है।

क्या सऊदी से नजदीकी कारण?

पाकिस्तान ने हाल में सऊदी अरब से रक्षा समझौते किए हैं. सैन्य सहयोग बढ़ाने की बात हुई है. कई विश्लेषक मानते हैं कि यूएई को यह रुख पसंद नहीं आया. खाड़ी में सऊदी और यूएई के बीच तनाव की खबरें पहले से हैं। ऐसे में पाकिस्तान का झुकाव साफ दिखा। इसका असर अब आर्थिक मोर्चे पर दिख रहा है।

यूएई ने दरवाजा बंद क्यों किया?

यूएई ने दो साल की मोहलत नहीं दी। केवल थोड़ी अवधि की राहत दी है। बताया गया कि अप्रैल तक रकम लौटानी होगी। ब्याज दर भी कम नहीं है। करीब साढ़े छह फीसदी की बात सामने आई है। पाकिस्तान के नेताओं ने कई बार संपर्क किया। विदेश मंत्री ने भी बात की। लेकिन शर्तें नहीं बदलीं।

क्या आईएमएफ आखिरी उम्मीद?

यूएई से राहत नहीं मिली तो पाकिस्तान ने आईएमएफ का रुख किया। वह चाहता है कि एक अरब डॉलर की किस्त जल्दी जारी हो। कुल सात अरब डॉलर का पैकेज पहले से तय है। लेकिन आईएमएफ की अपनी शर्तें होती हैं। सुधार करने पड़ते हैं। सब्सिडी घटानी पड़ती है। जनता पर बोझ बढ़ सकता है।

कितना बड़ा है कर्ज?

यूएई को करीब तीन अरब डॉलर लौटाने हैं। सऊदी अरब का पांच अरब डॉलर बाकी है। चीन का भी चार अरब डॉलर बकाया है। कुल मिलाकर पाकिस्तान करीब बारह अरब डॉलर टालना चाहता है। लेकिन हर देश अपने हित देख रहा है। सिर्फ भाईचारा काम नहीं आता। कर्ज आखिर कर्ज होता है।

भरोसा डगमगाया तो हालात और मुश्किल

अब सवाल है कि पाकिस्तान आगे क्या करेगा। क्या वह खाड़ी देशों के बीच संतुलन बनाएगा। या फिर एक तरफ खुलकर खड़ा रहेगा। आर्थिक हालात ज्यादा समय नहीं देते। विदेशी मुद्रा भंडार सीमित है। बाजार भरोसा देखता है। अगर भरोसा डगमगाया तो हालात और मुश्किल होंगे। यह मामला सिर्फ पैसे का नहीं है। यह कूटनीति की परीक्षा है। दोस्ती जरूरी है। लेकिन आर्थिक अनुशासन भी जरूरी है। पाकिस्तान को अब सख्त फैसले लेने होंगे। खर्च कम करना होगा। सुधार लागू करने होंगे। वरना हर कुछ महीनों में यही संकट लौटेगा। और हर बार शर्तें और कठोर होंगी। 

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