ट्रंप-मुनीर मुलाकात बनी पाकिस्तान की फजीहत की वजह! रक्षा सचिव ने खोली पोल

Donald Trump-Asim Munir Meet: डोनाल्ड ट्रंप और पाकिस्तान के फील्ड मार्शल असीम मुनीर की मुलाकात ने पाकिस्तान को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शर्मिंदा कर दिया है. इस हाई-प्रोफाइल बैठक में प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ को आमंत्रित नहीं किया गया, जिसे भारत के रक्षा सचिव ने पाकिस्तान की सत्ता संरचना पर सीधा सवाल बताया.

Shivani Mishra
Edited By: Shivani Mishra

Donald Trump-Asim Munir Meet: अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और पाकिस्तान के फील्ड मार्शल असीम मुनीर की हालिया मुलाकात पाकिस्तान के लिए शर्मिंदगी का कारण बन गई है. भारत के रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह ने इसे आतंक का गढ़ बन चुके मुल्क के लिए एक और अपमान बताया. उन्होंने कहा कि इस बैठक में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ को आमंत्रित नहीं किया गया, जिससे यह स्पष्ट हो गया कि असल सत्ता पाकिस्तान में सेना के हाथों में है.

ट्रंप ने असीम मुनीर के साथ इस मुलाकात को शानदार बताया, लेकिन पाकिस्तान के प्रधानमंत्री की गैरमौजूदगी ने दुनियाभर में उसकी दोहरी सत्ता और राजनीतिक अस्थिरता को उजागर कर दिया. यह पहली बार था जब किसी अमेरिकी राष्ट्रपति ने पाकिस्तानी सैन्य प्रमुख को व्यक्तिगत रूप से बुलाया और मुलाकात की, जबकि प्रधानमंत्री को दरकिनार कर दिया गया.

शहबाज शरीफ को नहीं भेजा गया न्योता

राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और फील्ड मार्शल असीम मुनीर की यह मुलाकात सिर्फ सैन्य बातचीत तक सीमित नहीं थी, बल्कि इसके राजनीतिक मायने भी गहरे हैं. इस बैठक में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ को न बुलाया जाना अपने-आप में पाकिस्तान की साख पर सवाल खड़ा करता है.

रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह ने समाचार एजेंसी एएनआई के पॉडकास्ट में कहा, "मेरे लिए यह चौंकाने वाली बात है. किसी भी देश के लिए यह शर्मनाक है कि उसका सैन्य प्रमुख बुलाया जाए और प्रधानमंत्री नदारद हो. यह बहुत ही अजीब स्थिति है."

सेना की ताकत का प्रदर्शन या सत्ता पर पूरी पकड़?

यह बैठक ऐसे समय पर हुई जब पाकिस्तान पहले से ही राजनीतिक और आर्थिक संकटों से जूझ रहा है. ट्रंप से मिलने के लिए असीम मुनीर के साथ केवल लेफ्टिनेंट जनरल असीम मलिक मौजूद थे, जो पाकिस्तान के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार भी हैं. इस तरह की मुलाकात यह दर्शाती है कि पाकिस्तान की नीतियों और अंतरराष्ट्रीय रिश्तों में सेना की भूमिका कितनी अहम है.

ऑपरेशन सिंदूर के बाद अमेरिका-पाकिस्तान में बढ़ी हलचल

ट्रंप और मुनीर की यह मुलाकात भारत द्वारा ऑपरेशन सिंदूर चलाने के बाद हुई, जो पहलगाम आतंकी हमले के जवाब में किया गया था. उस हमले में 26 पर्यटकों की मौत हुई थी. इसके बाद पाकिस्तान की भूमिका पर कई सवाल उठे और अमेरिका-पाक संबंधों में भी खिंचाव देखने को मिला.

नोबल के बदले मुलाकात?

व्हाइट हाउस के मुताबिक, यह बैठक इसलिए भी हुई क्योंकि असीम मुनीर ने ट्रंप को भारत-पाक के बीच परमाणु युद्ध रोकने के प्रयासों के लिए नोबल शांति पुरस्कार के लिए समर्थन दिया था. ट्रंप खुद कई बार दावा कर चुके हैं कि उन्होंने भारत और पाकिस्तान के बीच संघर्ष विराम कराने में अहम भूमिका निभाई.

भारत का जवाब: कोई मध्यस्थता नहीं हुई

हालांकि भारत ने साफ किया है कि साल 2021 में जो संघर्ष विराम हुआ, वह दोनों देशों के डायरेक्टर जनरल ऑफ मिलिट्री ऑपरेशंस (DGMO) के बीच आपसी समझ से हुआ था और इसमें किसी तीसरे पक्ष की कोई भूमिका नहीं थी. भारत सरकार ने कहा कि पाकिस्तान ने ही पहल कर बातचीत शुरू की थी.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में ट्रंप से फोन पर बात की, जिसमें उन्होंने दोहराया कि 7-10 मई के सैन्य गतिरोध के बाद जो शांति बनी, वह दोनों देशों की सेनाओं के सीधे संवाद से हुई थी.

रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह ने कहा, "मैं हमेशा से मानता आया हूं कि पाकिस्तान में अजीब सा ढांचा है जहां सेना ‘इंवेस्टमेंट फैसिलिटेशन काउंसिल’ जैसी संस्थाओं में बैठकर आर्थिक फैसले लेती है. सेना ही संसाधनों पर पहला दावा करती है. यह बेहद असंतुलित संरचना है."

उन्होंने कहा कि भारत को पाकिस्तान के खिलाफ एक ठोस और मजबूत प्रतिरोध खड़ा करना चाहिए ताकि आगे कोई आतंकी खतरा न बने.

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