ट्रंप की शॉर्ट-टर्म डील बनाम मोदी की लॉन्ग-टर्म प्लानिंग, समझिए वैश्विक राजनीति
गाजा संकट के बीच ट्रंप ने त्वरित समाधान के लिए ‘बोर्ड ऑफ पीस’ का रास्ता चुना है, जबकि पीएम मोदी संयुक्त राष्ट्र में सुधार के जरिए स्थायी वैश्विक व्यवस्था पर जोर दे रहे हैं.

दुनिया इस समय दो बड़े वैश्विक संकटों और कूटनीति के दो अलग-अलग दृष्टिकोणों को एक साथ देख रही है. एक ओर गाजा में युद्धविराम की घोषणा हो चुकी है, लेकिन इसके बावजूद हिंसा थमी नहीं है और आम नागरिक लगातार इसकी कीमत चुका रहे हैं. दूसरी ओर, दावोस में अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक नए ‘बोर्ड ऑफ पीस’ की घोषणा कर अंतरराष्ट्रीय राजनीति में नई बहस छेड़ दी है.
राष्ट्रपति ट्रंप की कूटनीति
राष्ट्रपति ट्रंप की कूटनीति तात्कालिक समाधान पर केंद्रित नजर आती है. उनका जोर तुरंत युद्ध रुकवाने और मध्य पूर्व में अमेरिकी प्रभाव को मजबूत करने पर है. ‘बोर्ड ऑफ पीस’ को वे एक ऐसे मंच के रूप में पेश कर रहे हैं, जो तेजी से फैसले लेकर संघर्षों को समाप्त कर सके. हालांकि, कई विशेषज्ञ इसे संयुक्त राष्ट्र के विकल्प के रूप में देखने लगे हैं, जिससे वैश्विक संस्थाओं की भूमिका पर सवाल उठ रहे हैं.
इसके विपरीत, भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सोच अल्पकालिक समझौतों से आगे जाती है. उनका फोकस ऐसी संस्थागत व्यवस्था को मजबूत करने पर है, जिससे भविष्य में संघर्षों को रोका जा सके. भारत लंबे समय से संयुक्त राष्ट्र में सुधार की मांग करता रहा है. प्रधानमंत्री मोदी और विदेश मंत्री एस. जयशंकर लगातार विभिन्न अंतरराष्ट्रीय मंचों से यह कहते आए हैं कि मौजूदा संयुक्त राष्ट्र, विशेषकर सुरक्षा परिषद, आज की वैश्विक वास्तविकताओं को पूरी तरह प्रतिबिंबित नहीं करती.
इसी क्रम में प्रधानमंत्री मोदी और ब्राजील के राष्ट्रपति लूला दा सिल्वा के बीच हुई हालिया बातचीत को अहम माना जा रहा है. यह चर्चा केवल भारत-ब्राजील संबंधों तक सीमित नहीं थी, बल्कि इसका व्यापक संदेश ग्लोबल साउथ के देशों के लिए था. दोनों नेताओं ने इस बात पर सहमति जताई कि एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका जैसे क्षेत्रों को वैश्विक निर्णय प्रक्रिया में उचित प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए.
संयुक्त राष्ट्र की स्थापना कब हुई थी?
संयुक्त राष्ट्र की स्थापना 1945 की परिस्थितियों में हुई थी, लेकिन आज की दुनिया पूरी तरह बदल चुकी है. मौजूदा समय में अधिकतर संघर्ष विकासशील क्षेत्रों में हो रहे हैं, जबकि निर्णय लेने की शक्ति अभी भी कुछ सीमित देशों के हाथों में केंद्रित है. इसी असंतुलन के कारण संयुक्त राष्ट्र की प्रभावशीलता और विश्वसनीयता पर सवाल उठ रहे हैं.
भारत, ब्राजील, जर्मनी और जापान जैसे G4 देशों ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार की प्रक्रिया को तेज करने की मांग की है. उनका मानना है कि सुधारों में देरी से वैश्विक अस्थिरता और मानवीय संकट और गहरे होंगे. भारत ने स्पष्ट किया है कि यदि अफ्रीका और अन्य उपेक्षित क्षेत्रों को उचित स्थान नहीं दिया गया तो संयुक्त राष्ट्र अपने उद्देश्य में सफल नहीं हो पाएगा.
कुल मिलाकर, डोनाल्ड ट्रंप और नरेंद्र मोदी की कूटनीति दो अलग रास्तों को दर्शाती है. एक त्वरित समाधान और व्यक्तिगत प्रभाव पर आधारित है, जबकि दूसरी दीर्घकालिक, संतुलित और संस्थागत वैश्विक व्यवस्था की ओर बढ़ने की कोशिश है. आने वाला समय तय करेगा कि दुनिया किस दिशा को अपनाती है.


