ग्रीनलैंड में क्या छुपा है कि ट्रंप हर हाल में चाहते हैं उस पर कब्जा? ट्रंप के नए बयान से मचा भूचाल
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ग्रीनलैंड को 'हर कीमत' पर खरीदने की ठान ली है. वे कहते हैं कि यह अमेरिका की सुरक्षा के लिए बेहद अहम है. लेकिन क्या बात सिर्फ नेशनल सिक्योरिटी तक ही सीमित है? जानकारों का मानना है कि इसके पीछे छिपे हैं कुछ और भी बड़े और रोचक राज हैं.

नई दिल्ली: अमेरिका की वैश्विक रणनीति एक बार फिर चर्चा के केंद्र में आ गई है. वेनेजुएला को लेकर उठे विवाद के बाद अब वॉशिंगटन की नजर ग्रीनलैंड पर टिक गई है. व्हाइट हाउस की प्रवक्ता कैरोलीन लेविट के उस बयान से हलचल तेज हो गई है, जिसमें उन्होंने ग्रीनलैंड को अमेरिकी सुरक्षा के लिए बेहद अहम बताया और कहा कि इसे हासिल करने के सभी विकल्पों पर विचार किया जा रहा है, “जिसमें सैन्य बल भी शामिल है.”
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पहले भी ग्रीनलैंड को लेकर कई बार अपनी मंशा जाहिर कर चुके हैं. इस बार उनका नया बयान अंतरराष्ट्रीय राजनीति में और ज्यादा गर्मी ले आया है. ट्रंप ने साफ शब्दों में कहा है कि अगर अमेरिका ग्रीनलैंड को “आसान तरीके” से हासिल नहीं कर पाया, तो वह “मुश्किल तरीका” अपनाएगा. हालांकि उन्होंने यह भी जोड़ा कि वह डेनमार्क के फैन हैं और वे उनके साथ हमेशा अच्छे रहे हैं.
ट्रंप क्यों बता रहे हैं ग्रीनलैंड को राष्ट्रीय सुरक्षा की कुंजी
डोनाल्ड ट्रंप बार-बार यह दोहराते रहे हैं कि ग्रीनलैंड अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए बेहद जरूरी है. उनके मुताबिक वहां रूसी और चीनी जहाजों की मौजूदगी चिंता का विषय है और अमेरिका नहीं चाहता कि ग्रीनलैंड चीन और रूस का पड़ोसी देश बने. इसी वजह से ट्रंप जल्द से जल्द इस इलाके पर नियंत्रण चाहते हैं.
आर्कटिक में अमेरिका की रणनीतिक रीढ़
ग्रीनलैंड की भौगोलिक स्थिति अमेरिका के लिए बेहद रणनीतिक मानी जाती है. यह नॉर्थ पोल के बेहद करीब स्थित है और आर्कटिक सर्कल में अमेरिकी सुरक्षा को मजबूती देता है. यहीं अमेरिका का “पिटुफिक स्पेस बेस” मौजूद है, जो मिसाइल डिटेक्शन और स्पेस सर्विलांस से जुड़ी अहम जानकारियां देता है. इस लोकेशन से अमेरिका को रूस, यूरोप और चीन की गतिविधियों पर नजर रखने में बड़ी बढ़त मिलती है.
आधुनिक खजानों से भरा ग्रीनलैंड
ग्रीनलैंड सिर्फ रणनीतिक नहीं, बल्कि संसाधनों के लिहाज से भी बेहद अहम है. यहां रेयर अर्थ एलिमेंट्स (REEs) का बड़ा भंडार है, जिससे अमेरिका की चीन पर निर्भरता कम हो सकती है, क्योंकि फिलहाल चीन दुनिया के करीब 90 फीसदी रेयर अर्थ पर नियंत्रण रखता है. इसके अलावा यहां यूरेनियम, लिथियम, कोबाल्ट, निकेल, तेल और गैस भी बड़ी मात्रा में मौजूद हैं, जिनका अमेरिका अभी अन्य देशों से आयात करता है.
नए ट्रेड रूट का गेटवे
क्लाइमेट चेंज के कारण आर्कटिक में बर्फ पिघलने से नए समुद्री रास्ते खुल रहे हैं, जिन्हें “आर्कटिक सिल्क रोड” कहा जा रहा है. ये रास्ते एशिया, यूरोप और अमेरिका के बीच दूरी को हजारों किलोमीटर तक कम कर सकते हैं, जिससे व्यापार लागत भी घटेगी. इन रूट्स पर नियंत्रण रखने वाला देश वैश्विक व्यापार पर बड़ा असर डाल सकता है, और ग्रीनलैंड इस नेटवर्क का अहम केंद्र है.
स्पेस और सैटेलाइट की दृष्टि से अहम
ग्रीनलैंड की लोकेशन पोलर सैटेलाइट्स के लिए बेहद अनुकूल मानी जाती है. यहां से स्पेस ट्रैकिंग, कम्युनिकेशन और सर्विलांस को मजबूत किया जा सकता है. अमेरिका का झुकाव अब तेजी से स्पेस वॉरफेयर और स्पेस सर्विलांस की ओर बढ़ रहा है, और इस नजरिए से ग्रीनलैंड की भूमिका और भी अहम हो जाती है.
चीन और रूस को रोकने की कोशिश
पिछले कुछ वर्षों में चीन ने आर्कटिक क्षेत्र में माइनिंग, इंफ्रास्ट्रक्चर और रिसर्च के जरिए अपनी मौजूदगी बढ़ाई है. वहीं रूस ने यहां सैन्य ठिकाने, न्यूक्लियर आइसब्रेकर और ऊर्जा परियोजनाओं के जरिए अपनी पकड़ मजबूत की है. अमेरिका नहीं चाहता कि ग्रीनलैंड में इन दोनों देशों का प्रभाव और सैन्य मौजूदगी बढ़े, इसी वजह से वह इस इलाके पर नियंत्रण की कोशिश कर रहा है.


