कैदियों के बदले कंकाल: हमास-इजरायल समझौते में दर्दनाक सौदा तय

हमास और इजरायल के बीच एक असाधारन और भावनात्म समझौता सामने आया है. इस टील के तहत इजरायल को 180 शव और 125 कैदी वापस मिलेंगे. सीजफायर और मानवीय दबाव के चलते नेतन्याहू ने यह दर्दनाक शर्तें मानने का फैसला किया है.

Lalit Sharma
Edited By: Lalit Sharma

इंटरनेशनल न्यूज. गाजा पट्टी में खून से सने दिन शायद थोड़ी राहत को ओर बढ़ रहे हैं. अमरिका की मध्यस्थता में इजरायल और हमास के बीच 60 दिन के सीजफायर का प्रस्ताव तैयार हुआ है. इस समझौते पर इजरायल के पीएम बेंजामिन नेतन्याहू ने सहमति जताई है. हालांकि उन्होंने कहा कि वह हर पहलू पर गंभीरता से विचार कर रहे हैं. सबसे चौंकेने वाली बात यह है कि इस सौदे में सिर्फ जिंदा बंधक ही नहीं, बल्कि 180 मृत इजरायली नागरिकों के शव भी शामिल हैं, जिन्हें हमास को सौंपा जाएगा.

125 फिलिस्तीनी कैदी रिहा, 28 जिंदा या मृत बंधक लौटेंगे

हमास की कैद में मौजूद 28 इजरायली बंधकों को छोड़ा जाएगा, जिनमें से कई की मौत की खबरें सामने आ चुकी हैं। जवाब में इजरायल 125 फिलिस्तीनी कैदियों को रिहा करेगा। इसके अलावा, इजरायल ने उन 180 शवों को लौटाने पर भी हामी भर दी है, जिन्हें वह मृत बंधकों के तौर पर हमास को सौंपेगा। यह अदला-बदली सिर्फ राजनीतिक नहीं, बल्कि भावनात्मक और कूटनीतिक सौदेबाज़ी भी है, जो पूरी दुनिया की निगाहों में आ चुकी है।

मिस्र-कतर के साथ अमेरिका भी बना गवाह

इस सीजफायर की पटकथा वॉशिंगटन, काहिरा और दोहा में लिखी गई। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप इस योजना को लेकर व्यक्तिगत रूप से सक्रिय हैं, जबकि मिस्र और कतर जैसे देश भी इस डील में मध्यस्थ की भूमिका निभा रहे हैं। वाइट हाउस ने साफ कहा कि इजरायल इस डील पर राज़ी हो चुका है। वहीं हमास ने शुक्रवार या शनिवार तक अपने फैसले की घोषणा करने का संकेत दिया है।

शांति की मजबूरी: यूरोप और अरब देशों का दबाव

हमास को इस डील के लिए तैयार होने की एक बड़ी वजह अंतरराष्ट्रीय दबाव भी है। जर्मनी, फ्रांस और ब्रिटेन जैसे यूरोपीय देशों ने हाल ही में इजरायल की कार्रवाई के खिलाफ प्रस्ताव पारित किया है। तुर्की और मलेशिया जैसे मुस्लिम देशों की ओर से भी लगातार गाजा में शांति की मांग की जा रही है। यही वजह है कि हमास पर भी सीजफायर स्वीकार करने का दबाव है।

ग्रेटा थनबर्ग भी कूदीं मैदान में

गाजा को लेकर अंतरराष्ट्रीय नाराज़गी इस कदर है कि पर्यावरण कार्यकर्ता ग्रेटा थनबर्ग भी अब मानवीय मदद लेकर गाजा पहुंच रही हैं। उनके साथ एक फ्रेंच-फिलिस्तीनी सांसद रीमा हसन भी होंगी। यह यात्रा फ्रीडम फ्लोटिला नामक मानवीय अभियान का हिस्सा है। 31 देशों के राजनयिक पहले ही गाजा का दौरा कर चुके हैं, जहां इजरायल की तरफ से फायरिंग भी हुई थी।

गाजा को सांस लेने दो, लेकिन किस कीमत पर? 

सवाल ये है कि सीजफायर क्या वाक्ई स्थायी शांति की ओर पहला कदम होगा, या बस एक राजनीतिक मजबूरी? जब कैदियों के बदले कंकालों की सौदेबाजी होने लगे लगे, तो समझना मुश्किल हो जाता है कि इंसानियत कितनी कीमत चुका रही है. नेतन्याहू की सहमति में शायद वही दबाब है, जो अब पूरी दुनिया महसूस क रहही है-कि गाजा आखिरकार सांस लेने दी जाए.

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