'बेटा होने वाला है', जेडी वेंस का पोस्ट और अमेरिका के सेक्स डिटरमिनेशन कानूनों की हकीकत
अमेरिका के उपराष्ट्रपति जेडी वेंस के एक सोशल मीडिया पोस्ट ने भारत में नई बहस छेड़ दी है. बेटे के होने की घोषणा करते हुए उन्होंने अनजाने में अमेरिका और भारत के सेक्स डिटरमिनेशन कानूनों के बीच बड़ा अंतर उजागर कर दिया.

नई दिल्ली: अमेरिका के उपराष्ट्रपति जेडी वेंस एक बार फिर सुर्खियों में हैं, लेकिन इस बार वजह राजनीति नहीं बल्कि उनका निजी जीवन है. जेडी वेंस और सेकंड लेडी उषा वेंस ने सोशल मीडिया के जरिए अपने चौथे बच्चे के आगमन की खुशखबरी साझा की है. खास बात यह रही कि उन्होंने अपने होने वाले बच्चे का लिंग भी सार्वजनिक कर दिया, जिसने भारत समेत कई देशों में लोगों का ध्यान खींचा है.
इस घोषणा के बाद सोशल मीडिया पर चर्चा तेज हो गई कि अमेरिका में जन्म से पहले बच्चे का लिंग बताना कैसे संभव है, जबकि भारत जैसे देशों में यह कानूनन अपराध है. जेडी वेंस का यह पोस्ट दरअसल अमेरिका और भारत के सेक्स डिटरमिनेशन कानूनों के बीच के बड़े अंतर को उजागर करता है.
सोशल मीडिया पर दी खुशखबरी
जेडी वेंस और उषा वेंस ने इंस्टाग्राम पर एक संयुक्त बयान जारी करते हुए लिखा,"हमें यह बताते हुए बहुत खुशी हो रही है कि उषा प्रेग्नेंट हैं. हमें एक बेटा होगा. उषा और बच्चा दोनों स्वस्थ हैं और हम सभी जुलाई के अंत में उसके स्वागत का इंतजार कर रहे हैं."
पोस्ट के मुताबिक, उनका चौथा बच्चा जुलाई के अंत तक जन्म लेगा. इस घोषणा में अजन्मे बच्चे के लिंग का खुलासा होना भारत में कई लोगों के लिए चौंकाने वाला रहा.
अमेरिका में भ्रूण के लिंग की जानकारी क्यों है सामान्य?
अमेरिका में गर्भ में पल रहे बच्चे का लिंग जानना या बताना किसी तरह का अपराध नहीं है. वहां भारत की तरह इस विषय पर कोई सख्त फेडरल कानून लागू नहीं है. अमेरिकी फेडरल सरकार ने ऐसा कोई कानून नहीं बनाया है जो राज्यों में भ्रूण के लिंग की जांच या जानकारी देने पर रोक लगाता हो.
क्लीनिक और टेस्टिंग सेंटर्स की भूमिका
अमेरिका में कई निजी फर्टिलिटी और जेनेटिक टेस्टिंग क्लीनिक गर्भावस्था के दौरान लिंग की जानकारी देते हैं. यह जानकारी आमतौर पर अल्ट्रासाउंड या जेनेटिक प्री-स्क्रीनिंग टेस्ट जैसे NIPT के जरिए मिलती है.
हालांकि, कुछ क्लीनिक नैतिक कारणों से या अपनी आंतरिक नीति के तहत लिंग की जानकारी तुरंत नहीं देते या बिल्कुल साझा नहीं करते. यह प्रतिबंध कानूनी नहीं बल्कि संस्थागत नीति के स्तर पर होता है.
क्या अमेरिका में लिंग के आधार पर गर्भपात पर रोक है?
अमेरिका में लिंग के आधार पर गर्भपात को लेकर भी कोई फेडरल कानून नहीं है. हालांकि, कुछ राज्यों ने अपने स्तर पर ऐसे गर्भपात पर प्रतिबंध लगाए हैं. पेंसिल्वेनिया, नॉर्थ कैरोलिना, एरिजोना और अर्कासस जैसे राज्यों में लिंग के आधार पर गर्भपात को अवैध माना गया है.इन राज्यों में यह रोक मुख्य रूप से प्रवासी समुदायों में बेटे की चाह के चलते होने वाली भ्रूण हत्या को रोकने के उद्देश्य से लगाई गई है.
भारत में क्या कहता है कानून?
भारत में भ्रूण के लिंग की जांच को लेकर बेहद सख्त कानून लागू है. लिंग-आधारित भेदभाव और कन्या भ्रूण हत्या को रोकने के लिए प्री-कंसेप्शन एंड प्री-नेटल डायग्नोस्टिक टेक्नीक्स (PCPNDT) एक्ट, 1994 लागू किया गया है.
इस कानून के तहत गर्भ में बच्चे का लिंग जानना या बताना पूरी तरह प्रतिबंधित है. अल्ट्रासाउंड या किसी भी मेडिकल जांच के जरिए लड़का या लड़की होने की जानकारी देना गैरकानूनी है.
किस पर होती है कार्रवाई?
PCPNDT एक्ट के तहत डॉक्टर, लैब, नर्सिंग होम या कोई भी व्यक्ति जो भ्रूण के लिंग की जांच या जानकारी देने में शामिल पाया जाता है, कानून के दायरे में आता है. गर्भवती महिला को भी लिंग पूछने या इसके लिए दबाव बनाने की अनुमति नहीं है.
पहली बार दोषी पाए जाने पर 3 साल तक की जेल और 10,000 रुपये तक जुर्माने का प्रावधान है. दोबारा अपराध पर सजा बढ़कर 5 साल की जेल और 50,000 रुपये तक जुर्माना हो सकता है. इसके अलावा दोषी डॉक्टर का मेडिकल रजिस्ट्रेशन भी रद्द किया जा सकता है.


