Ladakh Violence: राज्य की मांग को लेकर एक हुए बौद्ध और मुस्लिम, लद्दाख में बढ़ता जन आक्रोश ने बढ़ाई चिंता
Ladakh Violence: 2019 में लद्दाख के केंद्र शासित प्रदेश बनने पर लोग खुश हो गए थे इसलिए कि उम्मीद थी कि विकास को नई रफ्तार मिलेगी. लेकिन जल्द ही उत्साह असंतोष में बदल गया. लेह और कारगिल, पहले बंटे हुए, अब राज्य का दर्जा और 6वीं अनुसूची की मांग में एकजुट हैं. हाल की हिंसा और भूख हड़तालों ने आंदोलन को और तेज किया है.

Ladakh Violence: 2019 में जम्मू-कश्मीर से अलग होकर जब लद्दाख को केंद्र शासित प्रदेश का दर्जा मिला था तो इलाके में खुशी की लहर दौड़ गई थी. स्थानीय लोगों को उम्मीद थी कि अब विकास को नई रफ्तार मिलेगी और वे सीधे केंद्र से जुड़कर अपने संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल कर सकेंगे. लेकिन महज कुछ सालों में यह उत्साह असंतोष में बदल गया है. अब लेह और कारगिल, जो पहले राजनीतिक और सांस्कृतिक रूप से बंटे हुए माने जाते थे राज्य के दर्जे और 6वीं अनुसूची में शामिल किए जाने की मांग को लेकर लोग एकजुट हो गए हैं.
जैसा कि हाल ही में हुई हिंसा और भूख हड़तालों ने इस आंदोलन को और तीखा कर दिया है. जी हा नेपाल में सोशल मीडिया बैन के खिलाफ विरोध प्रदर्शन ने ऐसा रूप लिया जिसकी किसी ने कल्पना नहीं की थी. शुरुआत में इसे महज इंस्टाग्राम ना चला पाने से नाराज युवाओं का गुस्सा समझा गया, लेकिन देखते ही देखते ये आंदोलन व्यापक भ्रष्टाचार और सत्ता के खिलाफ जनाक्रोश में बदल गया. हालात इतने बिगड़े कि प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली को इस्तीफा देना पड़ा. इससे पहले बांग्लादेश और श्रीलंका भी इसी तरह के युवा-आंदोलनों से सत्ता परिवर्तन देख चुके हैं.
लद्दाख के नागरिक क्या चाह रहे ?
लद्दाख के नागरिकों का कहना है कि जम्मू-कश्मीर से अलग होकर भले ही वे सीधा केंद्र से जुड़ गए हों लेकिन उन्हें प्रशासन में भागीदारी नहीं मिल पा रही. अब न श्रीनगर का शासन है न जम्मू का सब कुछ दिल्ली से चल रहा है ऐसा मानना है स्थानीय संगठनों का. वे चाहते हैं कि लद्दाख को राज्य का दर्जा दिया जाए ताकि वे अपनी जमीन, भाषा, और संस्कृति की रक्षा के लिए नीतियां खुद बना सकें.
भाषा, संस्कृति और पहचान की रक्षा के लिए मांग
लद्दाखियों की एक प्रमुख मांग है कि क्षेत्र को संविधान की छठी अनुसूची में शामिल किया जाए. उनका कहना है कि इससे उनकी स्थानीय भाषा, परंपराएं और सांस्कृतिक पहचान को संवैधानिक संरक्षण मिलेगा. बौद्ध और शिया मुस्लिम समुदायों के प्रतिनिधियों ने इस बात पर बल दिया है कि बिना संवैधानिक गारंटी, लद्दाख की आत्मा खो जाएगी.
बीजेपी ऑफिस पर हमला
हालिया विरोध प्रदर्शन में लद्दाख में हिंसा भी देखी गई. उपद्रवियों ने बीजेपी कार्यालय पर हमला किया और एक पुलिस वैन को आग के हवाले कर दिया. इस उग्र प्रदर्शन के बाद प्रशासन हाई अलर्ट पर है और क्षेत्र में बंद का आयोजन किया गया है. राजनीतिक रूप से अक्सर असहमत रहने वाले लेह और कारगिल ने इस बार एकता दिखाई है. बौद्ध बहुल लेह और शिया बहुल कारगिल मिलकर 'लेह-कारगिल डेमोक्रेटिक अलायंस' (LKDA) के बैनर तले आंदोलन कर रहे हैं. यह संगठन केंद्र से मांग कर रहा है कि लद्दाख को राज्य का दर्जा दिया जाए और छठी अनुसूची में शामिल किया जाए.
अमित शाह से बातचीत
मार्च 2025 में केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह से लद्दाख के एक प्रतिनिधिमंडल ने मुलाकात की थी. लोगों को उम्मीद थी कि सरकार उनकी मुख्य मांगों पर ध्यान देगी लेकिन बातचीत किसी ठोस नतीजे पर नहीं पहुंची. स्थानीय संगठनों का आरोप है कि अमित शाह ने हमारी मूल मांगों को ही खारिज कर दिया. यही वजह है कि आंदोलन ने अब जमीनी स्वरूप ले लिया है. प्रसिद्ध पर्यावरणविद् सोनम वांगचुक भी आंदोलन के समर्थन में भूख हड़ताल पर बैठ गए हैं. उनका कहना है कि यह लड़ाई सिर्फ भू-राजनीतिक नहीं बल्कि पहचान और अस्तित्व की रक्षा की लड़ाई है.


