सुपर बाउल तक पहुंची एपस्टीन फाइल्स की परछाई, पीड़ितों ने विज्ञापन में पारदर्शिता को लेकर उठाई मांग

सुपर बाउल 2026 के दौरान एपस्टीन कांड के पीड़ितों ने जनसेवा संदेश जारी कर सभी फाइलों को बिना कटौती सार्वजनिक करने की मांग की. न्याय विभाग द्वारा जारी दस्तावेजों के बावजूद कई जानकारी अब भी छिपी होने का आरोप लगाया गया.

Shraddha Mishra

नई दिल्ली: सुपर बाउल 2026 जैसे विश्व स्तर के खेल आयोजन में जहां आमतौर पर मनोरंजन और खेल का जश्न होता है, वहां इस बार एक गंभीर और भावनात्मक संदेश ने सबका ध्यान खींच लिया. जेफरी एपस्टीन के यौन अपराधों से बचे लोगों ने इस बड़े मंच का इस्तेमाल करते हुए एक जनसेवा संदेश (पीएसए) जारी किया. उनका मकसद साफ था- एपस्टीन से जुड़ी सभी फाइलों को बिना किसी कटौती के सार्वजनिक किया जाए और पूरी सच्चाई देश के सामने लाई जाए.

अभियान की शुरुआत एक लिखित संदेश से होती है जिसमें बताया गया कि "19 नवंबर 2025 को एपस्टीन फाइल्स ट्रांसपेरेंसी एक्ट कानून बन गया." इसके बाद यह दावा किया गया कि लगभग 30 लाख दस्तावेज अब भी जारी नहीं किए गए हैं. कुछ शब्दों को जानबूझकर काले निशान से ढका गया था, ताकि यह दिखाया जा सके कि कितनी जानकारी अब भी छिपाई जा रही है.

वीडियो में कुछ महिलाएं मुंह पर काली पट्टी बांधे नजर आती हैं. वे कह रही हैं कि वर्षों तक चुप रहने के बाद अब वे एकजुट होकर खड़ी हैं. उनके हाथों में अपने बचपन की तस्वीरें होती हैं और वे दोहराती हैं कि उन्हें सच जानने का हक था. संदेश के अंत में अटॉर्नी जनरल पाम बोंडी से अपील की गई कि अब समय आ गया है कि पूरी सच्चाई सामने लाई जाए.

न्याय विभाग द्वारा जारी दस्तावेज

30 जनवरी को अमेरिकी न्याय विभाग ने एपस्टीन से जुड़े कई नए दस्तावेज सार्वजनिक किए. इन फाइलों में कई प्रसिद्ध और प्रभावशाली लोगों के नाम सामने आए. रिपोर्टों के अनुसार, इन दस्तावेजों में बिल गेट्स, बिल क्लिंटन, स्टीव बैनन, एलोन मस्क, सारा फर्ग्यूसन, दीपक चोपड़ा, लॉर्ड पीटर मैंडेलसन और प्रिंस एंड्रयू जैसे नाम शामिल बताए गए हैं. कुछ व्यक्तियों पर गलत आचरण या एपस्टीन के साथ संबंध रखने के आरोप लगाए गए हैं, हालांकि इन आरोपों को लेकर अलग-अलग प्रतिक्रियाएं भी सामने आई हैं.

अधूरी जानकारी पर सवाल

कई सांसदों और पीड़ितों का कहना है कि जो दस्तावेज जारी किए गए हैं, वे पूरी कहानी नहीं बताते. उनका आरोप है कि बड़ी मात्रा में जानकारी अब भी रोकी गई है या भारी संपादन के साथ सामने आई है. उनका मानना है कि कानून के तहत सभी दस्तावेज बिना छेड़छाड़ के जारी किए जाने चाहिए.

दूसरी ओर, न्याय विभाग का कहना है कि कुछ जानकारी पीड़ितों की निजता की रक्षा के लिए रोकी गई है. हालांकि, विभाग की आलोचना भी हुई है, क्योंकि कुछ संवेदनशील तस्वीरें सार्वजनिक होने की बात कही गई है. इस विरोधाभास ने और सवाल खड़े कर दिए हैं. मामले को शांत करने के लिए कुछ बिना संपादित दस्तावेज सांसदों के साथ साझा किए जाने की चर्चा है. लेकिन पीड़ितों और उनके समर्थकों की मांग है कि जब तक पूरी सच्चाई सामने नहीं आती, तब तक यह लड़ाई जारी रहेगी.

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