स्लो पॉइजन की साजिश? खालिदा जिया की मौत में शेख हसीना का हाथ, बीएनपी का बड़ा इल्जाम
बांग्लादेश में 12 फरवरी को आम चुनाव होने वाला है. शेख हसीना की पार्टी पर प्रतिबंध के बाद बीएनपी अब सत्ता की सबसे मजबूत दावेदार बन गई है. लेकिन पूर्व पीएम खालिदा जिया की मौत और 'स्लो पॉइजन' दिए जाने के आरोपों ने चुनाव से पहले ही राजनीति में तूफान खड़ा कर दिया है.

नई दिल्ली: बांग्लादेश में 12 फरवरी को होने वाले आम चुनाव से पहले सियासी माहौल बेहद गरमा गया है. शेख हसीना की सरकार के पतन के बाद यह पहला चुनाव है, जिसमें अवामी लीग पर प्रतिबंध के चलते वह चुनावी मैदान से बाहर है. ऐसे में बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी सत्ता की सबसे बड़ी दावेदार बनकर उभरी है, लेकिन इसके बावजूद देश की राजनीति अब भी शेख हसीना के इर्द-गिर्द ही घूमती नजर आ रही है.
चुनाव से ठीक पहले पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा जिया की मौत ने बांग्लादेश की राजनीति में भूचाल ला दिया है. 17 साल बाद बीएनपी के कार्यकारी अध्यक्ष तारिक रहमान की देश वापसी और खालिदा जिया के निधन के साथ ही ‘स्लो पॉइजन’ के आरोपों ने चुनावी बहस को और तीखा कर दिया है. आरोप लगाया जा रहा है कि शेख हसीना सरकार के दौरान खालिदा जिया के इलाज में जानबूझकर लापरवाही बरती गई.
चुनाव से पहले गरमाई बांग्लादेश की सियासत
शेख हसीना की अवामी लीग के चुनाव से बाहर होने के बावजूद, राजनीतिक विमर्श का केंद्र अब भी वही बनी हुई हैं. बीएनपी सत्ता में वापसी की पूरी तैयारी में जुटी है और खालिदा जिया की मौत के बाद पार्टी ने पूर्व सरकार पर सीधे सवाल खड़े करने शुरू कर दिए हैं.
मेडिकल बोर्ड प्रमुख के आरोप से मचा बवाल
खालिदा जिया के इलाज के लिए गठित मेडिकल बोर्ड के प्रमुख प्रोफेसर-डॉक्टर एफएम सिद्दीकी के आरोपों ने खलबली मचा दी है. उन्होंने कहा कि हाल ही में दिवंगत पूर्व प्रधानमंत्री और बीएनपी चेयरपर्सन के इलाज में जानबूझकर लापरवाही बरती गई.
उन्होंने आरोप लगाया कि गलत इलाज और लापरवाही के कारण खालिदा जिया के लिवर की हालत तेजी से बिगड़ी और उन्हें मौत के मुंह में धकेल दिया गया. एक रिपोर्ट के अनुसार, प्रोफेसर सिद्दीकी ने यह बातें खालिदा जिया के लिए सिविल सोसाइटी द्वारा आयोजित एक नागरिक शोक सभा में कही थीं.
इलाज के दौरान क्या हुआ?
प्रोफेसर सिद्दीकी ने बताया कि 27 अप्रैल 2021 को कोविड-19 से जुड़ी समस्याओं के बाद खालिदा जिया को एवरकेयर हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया था. इसके बाद मौजूदा मेडिकल बोर्ड ने उनके इलाज की जिम्मेदारी संभाली. 30 दिसंबर को उनकी मौत तक प्रोफेसर सिद्दीकी सीधे तौर पर उनकी मेडिकल देखरेख में शामिल रहे.
उन्होंने कहा कि उनके भर्ती होने के तुरंत बाद, हमारी देखरेख में, हमने जरूरी जांच की और हमें बहुत हैरानी और चिंता हुई कि मैडम लिवर सिरोसिस से पीड़ित थीं. फिर भी मेडिकल यूनिवर्सिटी की मेडिकल डिस्चार्ज समरी में उन्हें आर्थराइटिस के इलाज के लिए रेगुलर तौर पर मेथोट्रेक्सेट नाम की एक टैबलेट लेने के लिए कहा गया था और हॉस्पिटल में भर्ती होने के दौरान भी उन्हें यह दवा दी गई. हमने तुरंत दवा बंद कर दी.
‘स्लो पॉइजन’ का आरोप क्यों?
एफएम सिद्दीकी ने बताया कि खालिदा जिया रूमेटाइड आर्थराइटिस से पीड़ित थीं और रूमेटोलॉजिस्ट की सलाह पर दवाएं ले रही थीं. इसके साथ ही उन्हें मेटाबोलिक-एसोसिएटेड फैटी लिवर डिजीज भी था.
मैडम की लिवर की बीमारी का पता लगाना बहुत आसान था… हैरानी की बात है कि मैडम के लिवर फंक्शन टेस्ट में अजीब नतीजे आने के बाद भी, सरकार के बनाए डॉक्टरों ने न तो अल्ट्रासाउंड किया और न ही मेथोट्रेक्सेट बंद किया.
इसी संदर्भ में ‘स्लो पॉइजन’ के सवाल पर उन्होंने कहा कि मेरा जवाब है कि मेथोट्रेक्सेट वह दवा थी जिसने उनके फैटी लिवर की बीमारी को और खराब कर दिया और उसे लिवर सिरोसिस में बदल दिया. उस लिहाज से, यह उनके लिवर के लिए ‘स्लो पॉइजन’ था.
‘जानबूझकर की गई लापरवाही’ का दावा
प्रोफेसर सिद्दीकी ने कहा कि बेगम खालिदा जिया के इलाज में इस तरह की लापरवाही, और उनके लिवर के काम करने के तरीके में तेजी से आई गिरावट ने उन्हें मौत के मुंह में धकेल दिया. यह जानबूझकर की गई लापरवाही है. यह एक माफ न करने लायक जुर्म है, और इसकी जांच होनी चाहिए कि क्या यह उन्हें मारने की किसी बड़ी योजना का हिस्सा था.
उन्होंने यह भी कहा कि मेडिकल बोर्ड के पास उनके डायबिटीज और आर्थराइटिस के इलाज में लापरवाही के भी स्पष्ट सबूत हैं और इसकी उच्चस्तरीय जांच होनी चाहिए.
दावों पर उठते सवाल
हालांकि, प्रोफेसर सिद्दीकी के आरोपों पर सवाल भी उठ रहे हैं. बताया जा रहा है कि खालिदा जिया के इलाज के लिए बने मेडिकल बोर्ड में उनकी बहू ज़ुबैदा रहमान भी सदस्य थीं. ऐसे में यह सवाल खड़ा हो रहा है कि अगर साजिश थी, तो वह कैसे संभव हुई.
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि चुनाव से पहले बीएनपी शेख हसीना सरकार के फैसलों पर सवाल उठाकर एक ओर सहानुभूति वोट हासिल करना चाहती है, तो दूसरी ओर पूर्व सरकार को कठघरे में खड़ा करने की रणनीति पर काम कर रही है.
शेख हसीना बनाम बीएनपी
शेख हसीना और बीएनपी के रिश्ते हमेशा से तनावपूर्ण रहे हैं. शेख हसीना के शासनकाल में तारिक रहमान को देश छोड़ना पड़ा था. अब जब शेख हसीना भारत में निर्वासन का जीवन जी रही हैं और तारिक रहमान सत्ता की दौड़ में आगे नजर आ रहे हैं, तो बीएनपी ने उन पर राजनीतिक शिकंजा कसना शुरू कर दिया है.


