मोबाइल, ट्रेन और टीवी अब नहीं चलेगा अफगानिस्तान में! तालिबान ने बदल दिए रोजमर्रा के शब्द, जानिए नया नाम

अफगानिस्तान की तालिबान सरकार ने देश में इस्तेमाल होने वाले कई आम विदेशी शब्दों को बदलने का फैसला किया है. अब टीवी, मोबाइल, ट्रेन जैसे शब्दों की जगह स्थानीय या नए विकल्प इस्तेमाल किए जाएंगे.

Sonee Srivastav

नई दिल्ली: अफगानिस्तान की तालिबान सरकार ने देश में इस्तेमाल होने वाले कई आम विदेशी शब्दों को बदलने का फैसला किया है. अब टीवी, मोबाइल, ट्रेन जैसे शब्दों की जगह स्थानीय या नए विकल्प इस्तेमाल किए जाएंगे. तालिबान के सर्वोच्च नेता मौलवी हैबतुल्लाह अखुंदजादा ने इस संबंध में फरमान जारी किया है, जिसे रविवार से ही लागू कर दिया गया है.

विदेशी शब्दों की जगह सुझाएगी नए विकल्प

इस फरमान के तहत न्याय मंत्रालय की अगुवाई में एक विशेष समिति बनाई जाएगी. इसमें शिक्षा, उच्च शिक्षा, सूचना, संस्कृति मंत्रालय, विज्ञान अकादमी और प्रशासनिक अधिकारियों को शामिल किया जाएगा. समिति का काम होगा कि सभी विदेशी शब्दों का अध्ययन कर उनके लिए उपयुक्त स्थानीय विकल्प सुझाए. ये नए शब्द सरकारी दस्तावेजों, प्रशासनिक कामकाज और आधिकारिक भाषा में इस्तेमाल किए जाएंगे.

हर विभाग को बनानी होगी विदेशी शब्दों की लिस्ट

तालिबान सरकार ने सभी विभागों को आदेश दिया है कि वे अपने काम में आने वाले विदेशी शब्दों की सूची तैयार करें और समिति को बेहतर विकल्प सुझाएं. अंतिम फैसला मौलवी हैबतुल्लाह अखुंदजादा खुद लेंगे.

पहले भी हुए थे ऐसे प्रयास

अफगानिस्तान में भाषा को शुद्ध रखने की कोशिश पहले भी की गई है. वर्ष 2012 में तब के राष्ट्रपति हामिद करजई ने भी विदेशी शब्द हटाने का फरमान जारी किया था, लेकिन उस समय इस पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया गया और बदलाव बहुत कम हुए.

तालिबान सरकार पिछले पांच सालों से इस दिशा में सक्रिय है. कई शहरों में अंग्रेजी शब्दों वाले बैनर और बिलबोर्ड हटा दिए गए हैं. हाल के वर्षों में अंग्रेजी शब्दों को अरबी नामों से बदलने की भी कोशिश की गई, जिससे अरबी शब्दों की संख्या बढ़ गई.

फैसले का मकसद क्या है?

तालिबान सरकार का कहना है कि इस फैसले का उद्देश्य अफगानिस्तान की भाषा और संस्कृति को मजबूत करना है. विदेशी शब्दों की जगह स्थानीय शब्दों का इस्तेमाल बढ़ाने से लोगों की सांस्कृतिक पहचान बनी रहेगी. अब सभी सरकारी कामकाज और दस्तावेजों में नए शब्दों का इस्तेमाल अनिवार्य होगा. 

यह कदम तालिबान की भाषा नीति का हिस्सा माना जा रहा है. हालांकि, कई लोग इस फैसले को भाषा पर अनावश्यक हस्तक्षेप मान रहे हैं. देखना होगा कि नई समिति कितने प्रभावी ढंग से काम करती है और आम लोगों की जिंदगी पर इसका कितना असर पड़ता है.

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