न्यूक्लियर कंट्रोल का अंत? अमेरिका-रूस संधि समाप्त, शीत युद्ध जैसी दौड़ की आशंका
अमेरिका और रूस के बीच परमाणु हथियारों को सीमित करने वाला अंतिम समझौता अंतिम पड़ाव पर है. यह समझौता, पिछले लगभग तीन दशकों से अमेरिका और रूस के बीच हथियार नियंत्रण सहयोग की रीढ़ रहा है.

अमेरिका और रूस के बीच परमाणु हथियारों को सीमित करने वाला अंतिम समझौता अब अपने अंतिम पड़ाव पर है. गुरुवार को इस संधि की अवधि समाप्त होने के साथ ही दोनों देशों पर लगे परमाणु हथियारों की तैनाती संबंधी प्रतिबंध भी खत्म हो जाएंगे. इससे दुनिया को एक बार फिर अनियंत्रित परमाणु हथियारों की दौड़ में फंसने का खतरा सताने लगा है. चिंता इसलिए भी गहरी है क्योंकि यूक्रेन युद्ध के कारण बढ़े तनाव के बीच न तो अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और न ही रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन इस समझौते को आगे बढ़ाने में रुचि दिखा रहे हैं.
परमाणु हथियारों का करीब 87 प्रतिशत हिस्सा अमेरिका और रूस के पास
यह समझौता, पिछले लगभग तीन दशकों से अमेरिका और रूस के बीच हथियार नियंत्रण सहयोग की रीढ़ रहा है. इसी सहयोग ने शीत युद्ध के बाद परमाणु टकराव के खतरे को काफी हद तक कम किया था. आज की तारीख में दुनिया के कुल परमाणु हथियारों का करीब 87 प्रतिशत हिस्सा इन्हीं दो देशों के पास है. ऐसे में इस संधि का खत्म होना वैश्विक सुरक्षा के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है.
2010 में पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा और रूस के तत्कालीन राष्ट्रपति दिमित्री मेदवेदेव द्वारा हस्ताक्षरित न्यू स्टार्ट संधि के तहत दोनों देशों को अपने परमाणु हथियारों की संख्या 1,550 तक सीमित रखने पर सहमति बनी थी. इसके अलावा, मिसाइल स्थलों का निरीक्षण, सूचनाओं का आदान-प्रदान और सत्यापन की व्यवस्था भी शामिल थी. 2021 में इसे पांच साल के लिए बढ़ाया गया था, लेकिन अब इसका भविष्य अधर में लटक गया है.
संधि के खत्म होते ही अमेरिका और रूस कानूनी रूप से जितने चाहें उतने परमाणु हथियार विकसित और तैनात करने के लिए स्वतंत्र हो जाएंगे. ट्रंप पहले ही अंतरराष्ट्रीय हथियार नियंत्रण समझौतों को लेकर संदेह जता चुके हैं. उन्होंने हाल ही में कहा था कि अगर संधि खत्म होती है तो 'होने दिया जाए'. रूस का कहना है कि जब अमेरिका ने विस्तार के प्रस्ताव पर गंभीरता नहीं दिखाई तो वह भी अब किसी सीमा से बंधा नहीं है. हालांकि पुतिन ने 'जिम्मेदारी से काम करने' की बात जरूर कही है.
संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस की चेतावनी
इस घटनाक्रम ने संयुक्त राष्ट्र समेत पूरी दुनिया को चिंतित कर दिया है. संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने चेतावनी दी है कि दशकों बाद पहली बार ऐसा समय आया है जब दो सबसे बड़ी परमाणु शक्तियों पर कोई बाध्यकारी सीमा नहीं होगी. उन्होंने इसे वैश्विक शांति के लिए बेहद खतरनाक बताया.
विशेषज्ञों का मानना है कि इसका असर 1970 की परमाणु अप्रसार संधि (एनपीटी) पर भी पड़ेगा, जिसके तहत गैर-परमाणु देशों ने हथियार न बनाने का वादा किया है. यदि अमेरिका और रूस खुलेआम अपने शस्त्रागार बढ़ाते हैं तो अन्य देश भी सवाल उठा सकते हैं और नई हथियार होड़ शुरू हो सकती है.
हालात पहले ही चिंताजनक हैं. रूस और अमेरिका दोनों अपने परमाणु हथियारों का आधुनिकीकरण कर रहे हैं. ऐसे में न्यू स्टार्ट का अंत एक ऐसे दौर की शुरुआत का संकेत देता है, जहां अस्थिरता और तनाव वैश्विक राजनीति की नई पहचान बन सकते हैं.


