लंका में रावण को परास्त करने के बाद कहां चली गई वानर सेना, जानें पुराणों में क्या लिखा है?
Ramayana: रामायण में भगवान श्रीराम और रावण के बीच हुए महायुद्ध का विस्तार से वर्णन मिलता है. लेकिन इस युद्ध में विजय पाने के पीछे वानर सेना की भूमिका भी अत्यंत महत्वपूर्ण रही. नल-नील के नेतृत्व में समुद्र पर सेतु निर्माण से लेकर युद्ध में श्रीराम का साथ देने तक, वानर सेना ने अपना अतुलनीय योगदान दिया. युद्ध के बाद यह वानर सेना कहां गई और उनका क्या हुआ, यह जानना बेहद रोचक है.

Ramayana: रामायण महाकाव्य में केवल भगवान श्रीराम और रावण के बीच हुए युद्ध का वर्णन नहीं है, बल्कि वानर सेना और हनुमान जी की वीरता का भी उल्लेख है. रामायण के अनुसार, श्रीराम को लंका तक पहुंचाने और युद्ध में विजय दिलाने में वानर सेना की महत्वपूर्ण भूमिका रही थी. वानर सेना ने नल-नील के नेतृत्व में समुद्र पर सेतु का निर्माण किया और श्रीराम को लंका तक पहुंचाया.
लेकिन क्या आप जानते हैं कि रावण के पराजय के बाद यह वानर सेना कहां चली गई? रामायण काल में इस शक्तिशाली सेना ने क्या भूमिका निभाई और आगे उनका क्या हुआ? आइए, जानते हैं इससे जुड़े कुछ रोचक तथ्य.
युद्ध के बाद अयोध्या लौटे भगवान श्रीराम
जब रावण का वध कर श्रीराम ने युद्ध जीता, तो वे सीता माता और लक्ष्मण के साथ अयोध्या लौट गए. हनुमान जी ने भी भगवान राम और लक्ष्मण को सुरक्षित अयोध्या पहुंचाने में मदद की. रामायण के उत्तर कांड के अनुसार, लंका से लौटने के बाद सुग्रीव को किष्किन्धा का राजा बनाया गया और बाली के पुत्र अंगद को युवराज.
किष्किन्धा में वानर सेना की भूमिका
वानर सेना के प्रमुख योद्धा नल-नील ने सेतु निर्माण में अहम भूमिका निभाई थी. सुग्रीव के राजा बनने के बाद, नल-नील को किष्किन्धा राज्य में मंत्री पद दिया गया. ये दोनों अपनी चतुराई और नेतृत्व क्षमता के माध्यम से राज्य संचालन में सुग्रीव और अंगद को सहायता प्रदान करते थे. वानर सेना भी किष्किन्धा राज्य की सुरक्षा और समृद्धि में योगदान देती रही.
किष्किन्धा राज्य और उसका वर्तमान स्वरूप
रामायण काल का किष्किन्धा राज्य वर्तमान में कर्नाटक के तुंगभद्रा नदी के किनारे स्थित है. यह स्थान आज बेल्लारी जिले के पास है, जहां प्रसिद्ध हम्पी भी स्थित है. यहां की गुफाएं, जो कभी राम और लक्ष्मण के रुकने का स्थान थीं, आज भी ऐतिहासिक धरोहर के रूप में देखी जा सकती हैं.
नल-नील और सेतु निर्माण की कहानी
रामेश्वर की ओर कूच करते समय समुद्र पार करना सबसे बड़ी चुनौती थी. तब नल और नील ने समुद्र के भीतर ऐसे स्थान ढूंढ निकाले, जहां पुल का निर्माण किया जा सकता था. वानर सेना ने इन दोनों के निर्देशन में सेतु का निर्माण शुरू किया. इस पुल की मदद से श्रीराम ने लंका पहुंचकर रावण को पराजित किया.
वानर सेना और दंडक वन का संबंध
रामायण के अनुसार, किष्किन्धा के आसपास का क्षेत्र दंडकारण्य वन या दंडक वन के रूप में जाना जाता था. यहां का ऋष्यमूक पर्वत और तुंगभद्रा नदी के पास स्थित मतंग ऋषि का आश्रम वानर सेना के प्रमुख स्थलों में से एक था.
वानर सेना का योगदान कभी नहीं भुलाया जा सकता
अगर वानर सेना न होती, तो श्रीराम के लिए लंका पहुंचना और रावण पर विजय प्राप्त करना असंभव होता. नल-नील और वानर योद्धाओं के प्रयासों के कारण ही रामायण का यह महत्त्वपूर्ण अध्याय संभव हो पाया.
Disclaimer: ये आर्टिकल मीडिया रिपोर्ट्स पर आधारित है. JBT इसकी पुष्टि नहीं करता.


