'चिकन नेक' पर खतरे के बीच भारत की बड़ी रणनीति, रेल कॉरिडोर को जमीन के नीचे ले जाने की तैयारी

पूर्वोत्तर भारत की जीवनरेखा माने जाने वाले रणनीतिक 'चिकन नेक' कॉरिडोर की सुरक्षा को लेकर भारत ने बड़ी योजना बनाई है. बढ़ते क्षेत्रीय खतरों के बीच इस संवेदनशील इलाके में रेलवे ट्रैक को भूमिगत करने का फैसला रणनीतिक दृष्टि से अहम माना जा रहा है.

Yogita Pandey
Edited By: Yogita Pandey

नई दिल्ली: पूर्वोत्तर भारत को देश के बाकी हिस्सों से जोड़ने वाले रणनीतिक 'चिकन नेक' कॉरिडोर की सुरक्षा को लेकर केंद्र सरकार ने बड़ा कदम उठाने की योजना बनाई है. बढ़ते भू-राजनीतिक खतरों और सुरक्षा चिंताओं के बीच इस संवेदनशील हिस्से में रेलवे ट्रैक को भूमिगत करने का प्रस्ताव सामने आया है.

चिकन नेक की सुरक्षा पर फोकस

गुवाहाटी से मिली जानकारी के अनुसार, भारत सरकार बंगाल से पूर्वोत्तर राज्यों को जोड़ने वाले रणनीतिक 'चिकन नेक' कॉरिडोर को सुरक्षित करने के लिए करीब 40 किलोमीटर लंबे हिस्से में अंडरग्राउंड रेलवे ट्रैक बिछाने की योजना पर काम कर रही है. यह इलाका नेपाल, भूटान और बांग्लादेश से घिरा हुआ है और सबसे संकरे बिंदु पर इसकी चौड़ाई महज 25 किलोमीटर रह जाती है.

बजट में चार रेलवे ट्रैक का प्रस्ताव

रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव ने सोमवार को कहा कि बजट में पूर्वोत्तर को देश के अन्य हिस्सों से जोड़ने वाली रेलवे लाइन को चार ट्रैक तक विस्तार देने का प्रस्ताव शामिल है. इसे लंबे समय से चली आ रही जरूरत बताया जा रहा है, जिससे यातायात क्षमता और रणनीतिक मजबूती दोनों बढ़ेंगी.

कहां से कहां तक जाएगा अंडरग्राउंड ट्रैक

नॉर्थईस्ट फ्रंटियर रेलवे के महाप्रबंधक चेतन श्रीवास्तव के मुताबिक, यह भूमिगत रेलवे लाइन बंगाल में टिन माइल हाट से रंगापानी स्टेशन के बीच बनाई जाएगी. यह पूरा सेक्शन रणनीतिक दृष्टि से अत्यंत संवेदनशील माना जाता है.

क्यों लिया गया अंडरग्राउंड ट्रैक का फैसला

रेलवे ट्रैक को जमीन के नीचे ले जाने का फैसला प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष खतरों को देखते हुए लिया गया है. हाल के समय में बांग्लादेश में हसीना सरकार के पतन के बाद कुछ समूहों द्वारा ‘चिकन नेक को चोक करने’ जैसे बयान सामने आए, जिससे पूर्वोत्तर को देश से काटने की बात कही गई.

कुछ आवाज़ों ने इस क्षेत्र को 'ग्रेटर बांग्लादेश' की कल्पना से भी जोड़ा है, जबकि ढाका के चीन के साथ बढ़ते संपर्क को भी एक चेतावनी संकेत के रूप में देखा जा रहा है.

डोकलाम विवाद से मिली सीख

2017 के डोकलाम स्टैंडऑफ के दौरान भी सैन्य रणनीतिकारों ने सिलिगुड़ी कॉरिडोर की संवेदनशीलता पर चिंता जताई थी. विशेषज्ञों का मानना है कि इस मार्ग में किसी भी तरह का व्यवधान पूर्वोत्तर को अलग-थलग कर सकता है, जिससे सप्लाई लाइन टूटने और सेना की आवाजाही प्रभावित होने का खतरा रहता है.

संकट के समय भी कनेक्टिविटी बनाए रखने की रणनीति

एक अधिकारी ने कहा, "रेलवे ट्रैक को भूमिगत करना ऐसी रणनीति का हिस्सा है, जिससे संकट के समय भी कनेक्टिविटी बनी रहे और राष्ट्रीय सुरक्षा पर कोई असर न पड़े."

सरकार का मानना है कि यह कदम न सिर्फ बुनियादी ढांचे को मजबूत करेगा, बल्कि देश की रणनीतिक सुरक्षा को भी नई मजबूती देगा.

ताजा खबरें

ट्रेंडिंग वीडियो

close alt tag