बदल गया जमाना, लेकिन नहीं बदली परंपरा, जानिए बरसी गांव की होली की अनोखी कहानी

सहारनपुर के बरसी गांव में सदियों पुरानी मान्यता के कारण होली पर होलिका दहन नहीं किया जाता. ग्रामीणों का विश्वास है कि इसकी आग से प्राचीन शिव मंदिर में विराजमान भगवान शिव के चरण प्रभावित हो सकते हैं. हालांकि, गांव में रंगों के साथ होली उत्साह से मनाई जाती है.

Suraj Mishra
Edited By: Suraj Mishra

उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले से लगभग 45 किलोमीटर दूर स्थित बरसी गांव अपनी एक अनूठी और प्राचीन परंपरा के कारण हर साल होली के अवसर पर विशेष रूप से चर्चा में आ जाता है. देशभर में होली का त्योहार होलिका दहन के साथ मनाया जाता है. वहीं, इस गांव में रंग-गुलाल और उत्साह तो होता है, लेकिन होलिका दहन की परंपरा का पालन नहीं किया जाता. 

क्या है मान्यता? 

ग्रामीणों का कहना है कि यह परंपरा सदियों पुरानी है और इसके पीछे गहरी धार्मिक आस्था जुड़ी हुई है. गांव के पश्चिमी हिस्से में एक अत्यंत प्राचीन शिव मंदिर स्थित है, जिसे महाभारत काल से जुड़ा हुआ माना जाता है. स्थानीय लोगों की मान्यता है कि इस मंदिर में भगवान शिव स्वयं विराजमान हैं. ऐसी श्रद्धा है कि यदि गांव के भीतर होलिका दहन किया गया, तो उसकी अग्नि की गर्मी से भगवान शिव के चरण प्रभावित हो सकते हैं. इसी विश्वास के चलते गांव में आज तक होलिका दहन नहीं किया गया और लोग इस परंपरा का पूरी निष्ठा से पालन करते आ रहे हैं.

हालांकि, बरसी गांव में होली का उत्सव पूरी खुशियों और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ मनाया जाता है. लोग एक-दूसरे को रंग लगाकर और आपसी भाईचारे के साथ त्योहार की खुशियां साझा करते हैं. लेकिन होलिका दहन की पूजा करने के लिए गांव की विवाहित महिलाएं और बेटियां पास के अन्य गांवों में जाकर विधि-विधान से पूजन करती हैं. इससे उनकी धार्मिक आस्था भी बनी रहती है और गांव की परंपरा भी कायम रहती है.

मंदिर को लेकर कई पौराणिक कथाएं प्रचलित

इस शिव मंदिर को लेकर कई पौराणिक कथाएं भी प्रचलित हैं. एक मान्यता के अनुसार, इस मंदिर का निर्माण कौरवों के ज्येष्ठ पुत्र दुर्योधन ने कराया था. कहा जाता है कि जब पांडवों के बलशाली पुत्र भीम ने मंदिर को देखा, तो उन्होंने अपनी गदा से प्रहार कर मंदिर के मुख्य द्वार की दिशा बदल दी. इसी कारण मंदिर का प्रवेश द्वार पश्चिम दिशा की ओर हो गया और इसे पश्चिमाभिमुख शिव मंदिर के रूप में जाना जाने लगा.

एक अन्य लोककथा के अनुसार, भगवान कृष्ण भी महाभारत युद्ध के दौरान कुरुक्षेत्र जाते समय इस स्थान पर रुके थे और इसे विशेष धार्मिक महत्व प्रदान किया था. समय बीतने के साथ यह स्थान धार्मिक आस्था का केंद्र बन गया और गांव की पहचान भी इसी मान्यता से जुड़ गई.

आज आधुनिकता के इस दौर में भी बरसी गांव के लोग अपनी इस प्राचीन परंपरा को पूरी श्रद्धा और सम्मान के साथ निभा रहे हैं. होली के रंगों और उल्लास के बीच यहां होलिका दहन नहीं किया जाता, जिससे भगवान शिव के प्रति उनकी आस्था और विश्वास की झलक स्पष्ट रूप से दिखाई देती है. यही परंपरा इस गांव को अन्य स्थानों से अलग और विशिष्ट बनाती है.

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