जब मोबाइल ने छीन ली मासूमियत, डिजिटल जहर बनकर निगल गया बच्चे की सोच और खामोश होकर देखता रहा परिवार

आज का बच्चा बाहर से नहीं, बल्कि मोबाइल स्क्रीन से प्रभावित हो रहा है। इस मामले ने साबित किया कि इंटरनेट अगर निगरानी में न हो, तो मासूम सोच को बर्बाद कर सकता है।

Anuj Kumar
Edited By: Anuj Kumar

नई दिल्ली: आज तकनीक सीखने का साधन मानी जाती है, लेकिन इसी साधन ने एक बच्चे की सोच पर नकारात्मक असर डाला. बताया गया कि वह लंबे समय तक मोबाइल और लैपटॉप पर अकेले कंटेंट देखता रहा. धीरे-धीरे उसे ऐसे संदेश और चित्र दिखाए गए, जिनका असर गहरा होता गया. घरवालों को लगा वह पढ़ाई कर रहा है जबकि असल में उसके विचार बदलने लगे. ऑनलाइन माध्यम ने उसे वास्तविक संसार से दूर कर दिया। रोजमर्रा की बातों में उसका शामिल होना कम होने लगा.

क्या परिवार ने बदलाव पहचाना?

परिवार को शुरुआत में इस बदलाव का अंदाज़ा नहीं हुआ क्योंकि उसे लगा बच्चा पढ़ने में व्यस्त है। समय के साथ उसका व्यवहार बदलने लगा, लेकिन यह सोचकर नजरअंदाज किया गया कि उम्र के साथ यह सामान्य बात है. किसी ने यह नहीं सोचा कि स्क्रीन के पीछे क्या चल रहा है। बताया जाता है कि बच्चा धीरे-धीरे बात करना कम करने लगा और नजरें स्क्रीन से नहीं हटाता था. यह संकेत था कि उसकी सोच पर असर हो रहा है। जब तक परिवार को समझ आया, स्थिति गंभीर हो चुकी थी.

इंटरनेट ने कैसे डाला प्रभाव?

दावा है कि डिजिटल माध्यम से उसे ऐसे विचारों से जोड़ा गया जो नफरत और हिंसा को सही ठहराते हैं. उसे बताया गया कि समानता नहीं, बल्कि विभाजन सही है. तस्वीरें और वीडियो उसे लगातार दिखाए गए जिनमें चरम सोच को बढ़ावा दिया गया. यह प्रक्रिया इतनी शांत तरीके से हुई कि किसी को भनक नहीं लगी. बच्चे ने इसे सच मानना शुरू किया क्योंकि उसे समझ नहीं था कि यह गलत है. तकनीक की चुप्पी ने उसके मानसिक ढांचे को अंदर से बदल दिया.

क्या निगरानी से बचा गया?

घर में डिजिटल उपकरण मौजूद थे, लेकिन उनका उपयोग कब और कैसे हो रहा है, इस पर ध्यान नहीं दिया गया. बच्चे को बिना रोकटोक स्क्रीन तक पहुंच मिली. विशेषज्ञों के अनुसार, निगरानी की कमी ने स्थिति बिगाड़ दी. इंटरनेट से मिले संदेशों ने उसकी सोच को धीरे-धीरे नई दिशा दी. मोबाइल पर बिताया गया समय परिवार के साथ बिताए समय से अधिक हो गया. यह अंतर इंतजार करता रहा कि कोई रोक लगाए, लेकिन रोक लगाने वाला कोई नहीं था.

क्या मानसिक असर स्पष्ट हुआ?

धीरे-धीरे उसके बोलने का तरीका बदला और तर्क भी कठोर होने लगे. उसने उन बातों पर विश्वास करना शुरू किया जो सामान्य सोच से हटकर थी. यह बदलाव शांत लेकिन खतरनाक था. विशेषज्ञ बताते हैं कि जब बच्चा वास्तविकता से दूर होकर ऑनलाइन दुनिया में जीने लगे तो मानसिक संतुलन प्रभावित होता है. घरवालों ने इस बदलाव को गंभीरता से नहीं लिया. यह वही समय था जब रोकना जरूरी था.

क्या बड़ी चेतावनी सामने आई?

जब मामला उजागर हुआ तो सुरक्षा एजेंसियां सतर्क हो गईं. उन्होंने माना कि यह घटना तकनीकी खतरे की नई दिशा दिखाती है. अब खतरा सीमाओं से नहीं बल्कि ऑनलाइन बातचीत से आ रहा है. विशेषज्ञों ने कहा कि ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए परिवारों को सतर्क होना होगा. बच्चों को सिर्फ उपकरण नहीं, सही डिजिटल प्रशिक्षण भी देना जरूरी है. यह मामला आधुनिक समय की सबसे गंभीर चेतावनी साबित हो रहा है.

समाधान क्या हो सकता है?

विशेषज्ञ कहते हैं कि बच्चों को इंटरनेट से दूर नहीं किया जा सकता, लेकिन उनकी गतिविधि पर नजर रखना जरूरी है. घर में जब बच्चा स्क्रीन पर समय बिताए तो परिवार को समझना होगा कि वह क्या देख रहा है. तकनीक का उपयोग सही दिशा में तभी होगा जब उसकी देखभाल की जाए. बच्चे को भावनात्मक रूप से जोड़े रखना भी उतना ही जरूरी है. आज का सबक यही है कि डिजिटल दुनिया में बचपन की रक्षा करना अब सबसे बड़ी जिम्मेदारी है.
 

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