दंड देने का अधिकार केवल न्यायपालिका के पास...UP में जारी बुलडोजर एक्शन पर क्यों भड़क उठा इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हमीरपुर जिले में याचिकाकर्ताओं की संपत्तियों को बुलडोजर से तोड़ने पर रोक लगाई है. कोर्ट ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बावजूद राज्य में इमारतों को दंड के रूप में गिराने की कार्रवाई जारी है. याचिकाकर्ताओं ने एफआईआर को चुनौती दी है, जिसमें उनके रिश्तेदार पर गंभीर आरोप लगे हैं.

उत्तर प्रदेश : इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हमीरपुर जिले से जुड़े एक विवादास्पद मामले में याचिकाकर्ताओं की संपत्तियों को बुलडोजर से तोड़ने से बचाने की अपील पर सुनवाई करते हुए गंभीर नाराजगी जताई. जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस सिद्धार्थ नंदन की डिवीजन बेंच ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट फैसले के बावजूद राज्य में इमारतों को दंड के रूप में गिराने की कार्रवाई जारी है.
इसके साथ ही कोर्ट ने कई ऐसे उदाहरणों का जिक्र किया जहां अपराध के तुरंत बाद नोटिस जारी कर कानूनी प्रक्रिया का महज दिखावा करके संपत्तियां ध्वस्त कर दी जाती हैं. इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट के उस सिद्धांत पर जोर दिया गया कि इमारतों को सजा के तौर पर तोड़ना शक्तियों के बंटवारे का उल्लंघन है, क्योंकि दंड देने का अधिकार केवल न्यायपालिका के पास है.
आपको बता दें कि याचिकाकर्ता फैमुद्दीन और दो अन्य, जो सुमेरपुर के निवासी हैं और पारिवारिक रिश्तेदार हैं, ने हमीरपुर के सुमेरपुर थाने में 16 जनवरी 2026 को दर्ज एफआईआर को चुनौती दी है. यह एफआईआर आरोपी आफान खान, जो याचिकाकर्ताओं का रिश्तेदार है, के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की विभिन्न धाराओं, आईटी एक्ट, पॉस्को एक्ट और यूपी धर्मांतरण निषेध अधिनियम के तहत दर्ज की गई थी.
पुलिस की मिलीभगत से भीड़ ने घर पर हमला किया
याचिकाकर्ताओं ने दावा किया कि घटना के बाद पुलिस की मिलीभगत से भीड़ ने उनके घर पर हमला किया, नोटिस जारी किया गया और एक कमर्शियल संपत्ति 'इंडियन लॉज' को सील कर दिया गया. हालांकि, याचिकाकर्ता नंबर एक एफआईआर में सह-आरोपी नहीं हैं, फिर भी उनके आवासीय घर को निशाना बनाया गया.
कार्रवाई अपराध के तुरंत बाद की गई
याचिकाकर्ताओं की ओर से तर्क दिया गया कि यह कार्रवाई अपराध के तुरंत बाद की गई, जो संदिग्ध है. वहीं, राज्य की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता अनूप त्रिवेदी ने शुरुआती आपत्ति उठाई कि याचिका समय से पहले दायर की गई है, क्योंकि कोई अंतिम कार्रवाई नहीं हुई और याचिकाकर्ताओं को नोटिस का जवाब देने का मौका है. राज्य ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ताओं ने तथ्यों को छिपाया, जैसे उनकी आरा मिल से प्रतिबंधित लकड़ी बरामद होने पर सीलिंग. हालांकि, राज्य ने कोर्ट को आश्वासन दिया कि कानूनी प्रक्रिया का पालन किए बिना कोई तोड़फोड़ नहीं होगी.
कोर्ट ने पांच महत्वपूर्ण सवाल तैयार किए
मामले की गंभीरता को देखते हुए कोर्ट ने आर्टिकल 14 और 21 के मौलिक अधिकारों तथा राज्य की तोड़फोड़ शक्तियों के बीच संतुलन पर पांच महत्वपूर्ण कानूनी सवाल तैयार किए. इनमें सुप्रीम कोर्ट के फैसले का पालन, सार्वजनिक उद्देश्य की अनुपस्थिति में तोड़फोड़ की वैधता, कार्यकारी विवेक का दुरुपयोग, हितों का संतुलन और 'तोड़फोड़ का उचित भय' जैसे मुद्दे शामिल हैं. कोर्ट ने अंतरिम आदेश में पहले के स्टे को जारी रखा, पुलिस को याचिकाकर्ताओं की जान-माल की सुरक्षा सुनिश्चित करने और संपत्तियों में निर्बाध आवागमन की अनुमति दी. अगली सुनवाई नौ फरवरी को निर्धारित की गई है.


