टॉक्सिक वर्क कल्चर पर महिला का फूटा गुस्सा, बोली- पेड लीव कोई एहसान नहीं! वीडियो वायरल
आज के दौर में एक आम कॉर्पोरेट कर्मचारी के लिए अवकाश लेना सिर्फ काम से ब्रेक नहीं बल्कि गहरी मानसिक चिंता और बेवजह के गिल्ट का सबब बन चुका है.

नई दिल्ली: क्या दफ्तर से छुट्टी के लिए लीव अप्लाई करते समय आपके हाथ भी कांपते हैं? आज के दौर में एक आम कॉर्पोरेट कर्मचारी के लिए अवकाश लेना सिर्फ काम से ब्रेक नहीं बल्कि गहरी मानसिक चिंता और बेवजह के गिल्ट का सबब बन चुका है. इसी 'टॉक्सिक वर्क कल्चर' पर कड़ा प्रहार करते हुए 'माहीर' नाम की एक डिजिटल कंटेंट क्रिएटर का वीडियो सोशल मीडिया पर जबरदस्त तहलका मचा रहा है.
कड़वी सच्चाई
माहीर ने कॉर्पोरेट लाइफ की उस कड़वी और दबी हुई सच्चाई को उजागर किया है जिससे देश-दुनिया के लाखों नौकरीपेशा लोग हर दिन चुपचाप जूझ रहे हैं.
छुट्टी मांगने के लिए इतनी सफाई क्यों?
यह पूरा मामला तब चर्चा में आया जब माहीर ने बकरीद के पावन मौके पर एक छोटा सा ब्रेक लेने का अपना व्यक्तिगत अनुभव इंटरनेट पर साझा किया. उन्होंने बताया कि छुट्टी पर जाने से पहले उन्होंने अपनी जिम्मेदारी का सारा काम एडवांस में निपटा दिया था.
इतना गिल्ट क्यों महसूस कराया जाता
इसके बावजूद उनके दिमाग पर दफ्तर का एक अनकहा और अदृश्य दबाव हावी था. वीडियो में माहीर कहती हैं कॉर्पोरेट में काम करते हुए छुट्टी लेने पर हमें इतना गिल्ट क्यों महसूस कराया जाता है?
पेड लीव को लेकर फूटा गुस्सा
मैं ईद के तीसरे दिन अपनी 'पेड लीव' ले रही हूं. मजेदार बात यह है कि मेरा सारा काम समय से पहले पूरा है. मैं कहीं गायब नहीं हो रही सिर्फ अपनी बची हुई छुट्टियों का इस्तेमाल कर रही हूं. फिर भी मेरे अंदर एक अजीब सा डर क्यों पैदा हो रहा है. उन्होंने आगे कहा कि यह सिर्फ उनकी दास्तां नहीं है बल्कि हर उस कर्मचारी की हकीकत है.
लंबा-चौड़ा ईमेल
छुट्टी के लिए अपने मैनेजर को एक लंबा-चौड़ा ईमेल लिखता है मानो वह अपनी किसी गलती की सफाई दे रहा हो. किसी भी छुट्टी के लिए खुद को जरूरत से ज्यादा 'जस्टिफाई' करना ही इस आधुनिक कॉर्पोरेट कल्चर की सबसे बड़ी खराबी है.
आराम कोई अवॉर्ड नहीं है
कंटेंट क्रिएटर ने इस बात पर विशेष जोर दिया कि अवकाश लेने का मतलब यह कतई नहीं होता कि संबंधित कर्मचारी कामचोर है या उसे अपने करियर की परवाह नहीं है. उन्होंने दृढ़ता से कहा मेरा पूरा अस्तित्व सिर्फ और सिर्फ कंपनी की प्रोडक्टिविटी के इर्द-गिर्द नहीं घूम सकता.
त्योहार पर छुट्टी न मिलने का दूख
त्योहार पर छुट्टी लेने से कोई आलसी या गैर-जिम्मेदार नहीं हो जाता. आज के कॉर्पोरेट सिस्टम ने एक ऐसी बीमार मानसिकता बना दी है जहां हमें लगता है कि आराम करने के बुनियादी अधिकार को भी हमें किसी अवॉर्ड की तरह पहले कमाना पड़ेगा.
फूटा कर्मचारियों का गुस्सा
इस वीडियो के वायरल होते ही कमेंट सेक्शन में कॉर्पोरेट कर्मचारियों के दबे गुस्से और दर्द का सैलाब आ गया. एक यूजर ने लिखा, जब भी छुट्टी मांगो पूरी कहानी सुनानी पड़ती है. जरूरत से ज्यादा समझाना मानसिक रूप से थका देता है. दूसरे यूजर ने कड़ा रुख अपनाते हुए लिखा पेड लीव हमारा कानूनी हक है. यह हमारी CTC का हिस्सा होती है कंपनियां इसे देकर हम पर कोई मेहरबानी नहीं कर रहीं.
यूजर ने मैनेजरों को लेकर क्या कहा
कुछ कर्मचारियों ने तो अपने मैनेजरों के ऐसे रवैये साझा किए जो चौंकाने वाले हैं. एक यूजर ने बताया जब मैंने लीव मांगी, तो बॉस ने कहा कि यह काम तो तुम वीकेंड शनिवार-रविवार को भी कर सकते थे, छुट्टी की क्या जरूरत है? यानी हमारे कामकाजी दिन भी उनके और साप्ताहिक अवकाश भी उनका.
यूजर ने ली चुटकी
एक अन्य यूजर ने चुटकी लेते हुए लिखा कॉर्पोरेट के असली संघर्ष का अंदाजा तब तक नहीं होता जब तक आपको अपने सबसे करीबी दोस्त की शादी में शामिल होने के लिए रविवार के दिन भी 'हाफ-डे लीव' के लिए बॉस के सामने भीख न मांगनी पड़े. यह वीडियो वर्तमान समय में कार्यस्थल पर मानसिक स्वास्थ्य और वर्क-लाइफ बैलेंस की जरूरत पर एक गंभीर बहस छेड़ चुका है.


