डॉलर के मुकाबले रिकॉर्ड निचले स्तर पर रुपया, आम आदमी से सरकार तक बढ़ी चिंता

डॉलर के मुकाबले रुपया रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गया है, जिससे महंगाई से लेकर निवेश, विदेश यात्रा और सरकारी खर्च तक हर स्तर पर असर दिखने लगा है. वैश्विक अनिश्चितता और विदेशी पूंजी की निकासी ने भारतीय मुद्रा पर दबाव बढ़ा दिया है.

Yogita Pandey
Edited By: Yogita Pandey

नई दिल्ली: अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपया लगातार कमजोर होता जा रहा है. बुधवार को रुपया 68 पैसे टूटकर 91.65 (अस्थायी) के अब तक के सबसे निचले स्तर पर बंद हुआ. वैश्विक बाजारों में बढ़ती अनिश्चितता, जोखिम से बचने की निवेशकों की प्रवृत्ति और विदेशी पूंजी की लगातार निकासी के चलते घरेलू मुद्रा पर दबाव बना हुआ है.

विदेशी मुद्रा कारोबारियों के अनुसार, इससे पहले 16 दिसंबर 2025 को रुपया 91.14 प्रति डॉलर के रिकॉर्ड निचले स्तर पर बंद हुआ था. मौजूदा महीने में अब तक रुपये में करीब 1.50 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की जा चुकी है, जिसकी प्रमुख वजह वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव और कमजोर निवेश धारणा मानी जा रही है.

क्यों लगातार कमजोर हो रहा है रुपया

बाजार विशेषज्ञों का कहना है कि वैश्विक स्तर पर अनिश्चितता बढ़ने से उभरती अर्थव्यवस्थाओं पर दबाव बढ़ा है. ग्रीनलैंड मुद्दे और संभावित शुल्क को लेकर अमेरिका और यूरोप के बीच बढ़ते तनाव ने निवेशकों को सतर्क कर दिया है. इसके साथ ही घरेलू शेयर बाजारों में नकारात्मक रुझान ने भी विदेशी निवेशकों की धारणा को कमजोर किया है.

इसके अलावा, ग्रीनलैंड विवाद से उपजे अमेरिका-यूरोप तनाव, नाटो के भविष्य को लेकर आशंकाएं और वेनेजुएला के तेल भंडार पर अमेरिका के नियंत्रण जैसे भू-राजनीतिक घटनाक्रम वैश्विक व्यापार को प्रभावित कर रहे हैं. भारत के संदर्भ में, अमेरिका के साथ लंबित व्यापार समझौता एक अहम स्थिरता कारक बना हुआ है, जिसके पूरा होने से विश्वास और द्विपक्षीय व्यापार को मजबूती मिल सकती है.

डॉलर इंडेक्स में मामूली गिरावट

इस बीच, छह प्रमुख वैश्विक मुद्राओं के मुकाबले डॉलर की मजबूती को दर्शाने वाला डॉलर सूचकांक 0.02 प्रतिशत की गिरावट के साथ 98.61 पर रहा. इसके बावजूद रुपये पर दबाव बना रहा, जो घरेलू और वैश्विक दोनों कारकों की ओर इशारा करता है.

आम आदमी पर क्या पड़ेगा असर

रुपये की कमजोरी का सीधा असर आम लोगों की जेब पर पड़ता है. पेट्रोल-डीजल, एलपीजी, मोबाइल, इलेक्ट्रॉनिक्स और दवाइयों जैसी आयातित वस्तुएं महंगी हो सकती हैं. कंपनियां बढ़ी हुई लागत का बोझ उपभोक्ताओं पर डाल सकती हैं, जिससे घर का बजट बिगड़ने का खतरा रहता है.

इसके अलावा, एफडी और बचत पर रुपये की गिरावट का कोई सीधा फायदा नहीं मिलता, उल्टा महंगाई बढ़ने से खर्च ज्यादा हो सकता है.

निवेशकों के लिए बढ़ी अनिश्चितता

कमजोर रुपया शेयर बाजार में उतार-चढ़ाव बढ़ा सकता है. आयात पर निर्भर कंपनियों के शेयर दबाव में आ सकते हैं, जबकि निर्यात आधारित कंपनियों के शेयरों में तेजी देखने को मिल सकती है. विदेशी निवेशक मुनाफावसूली कर सकते हैं, जिससे बाजार पर अतिरिक्त दबाव बनता है.

पर्यटकों और विदेश यात्रियों पर असर

रुपये की गिरावट से विदेश जाने वाले भारतीयों के लिए यात्रा महंगी हो जाती है. होटल, खाना, ट्रांसपोर्ट और शॉपिंग पर ज्यादा खर्च करना पड़ता है. अमेरिका, यूरोप और सिंगापुर जैसे देशों की यात्राएं और भी महंगी हो सकती हैं.

हवाई टिकट, वीजा शुल्क, ट्रैवल इंश्योरेंस और अंतरराष्ट्रीय कार्ड व फॉरेक्स से जुड़े खर्च भी बढ़ जाते हैं.

विदेशी पर्यटकों को फायदा

जहां भारतीय यात्रियों को नुकसान होता है, वहीं कमजोर रुपया विदेशी पर्यटकों के लिए भारत को सस्ता बनाता है. इससे पर्यटन क्षेत्र को कुछ हद तक फायदा मिलने की संभावना रहती है.

विदेश में पढ़ाई और इलाज हुआ महंगा

विदेश में पढ़ाई करने वाले छात्रों के लिए ट्यूशन फीस, हॉस्टल और रहन-सहन का खर्च बढ़ जाता है. अभिभावकों को ज्यादा रुपये भेजने पड़ते हैं और एजुकेशन लोन का बोझ भी बढ़ सकता है.

इसी तरह, अमेरिका और यूरोप जैसे देशों में इलाज कराने वालों के लिए अस्पताल खर्च और दवाइयां पहले से ज्यादा महंगी हो जाती हैं.

कारोबारियों पर मिला-जुला असर

आयात पर निर्भर कारोबारियों को कच्चा माल और मशीनरी महंगी पड़ती है, जिससे मुनाफा घट सकता है या कीमतें बढ़ानी पड़ती हैं. खासकर छोटे आयातकों पर इसका सबसे ज्यादा दबाव पड़ता है.

वहीं निर्यातकों के लिए कमजोर रुपया फायदेमंद साबित होता है. डॉलर में होने वाली कमाई रुपये में ज्यादा हो जाती है, जिससे आईटी, टेक्सटाइल, फार्मा और ऑटो पार्ट्स जैसे सेक्टर लाभ में रहते हैं.

सरकार और अर्थव्यवस्था के लिए चुनौती

रुपये की गिरावट से सरकार पर भी असर पड़ता है. कच्चे तेल और उर्वरकों के आयात पर खर्च बढ़ने से सब्सिडी का बोझ बढ़ सकता है. साथ ही चालू खाता घाटा बढ़ने की आशंका रहती है, जिससे महंगाई पर काबू पाना सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती बन जाता है.

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