विश्व रेडियो दिवस: जब पूरा देश ठहर जाता था एक आवाज सुनने के लिए
रेडियो और हिंदी सिनेमा ने साथ-साथ विकसित होकर भारतीय समाज की सांस्कृतिक धड़कन को आकार दिया. खासकर 1950–60 के दशक में जब रेडियो ने फिल्मी गीतों को घर-घर पहुंचाया.

1960 के दशक के दौर में भारतीय मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए रेडियो ही मनोरंजन और जानकारी का सबसे भरोसेमंद माध्यम था. छोटे से इस यंत्र ने न केवल घरों को आपस में जोड़ा, बल्कि हिंदी सिनेमा को भी दूर-दराज़ तक पहुंचाने में अहम भूमिका निभाई. सिनेमा जहां पर्दे पर दृश्य रचता था, वहीं रेडियो उन्हीं दृश्यों को ध्वनि के माध्यम से जन-जन तक पहुंचाता था.
रेडियो प्रसारण कब शुरू हुआ?
भारत में नियमित रेडियो प्रसारण 1930 के दशक के आखिर में शुरू हुआ. लगभग उसी समय 1931 में पहली बोलती फिल्म आलम आरा रिलीज़ हुई. यह वह काल था जब सिनेमा और रेडियो ने साथ-साथ अपनी यात्रा शुरू की. शुरुआती वर्षों में श्रोता फिल्मी गीतों और समीक्षाओं के दीवाने थे. 1950 के दशक में जब फिल्मों का ग्लैमर बढ़ रहा था लेकिन उनकी पहुंच सीमित थी, तब रेडियो सीलोन और विविध भारती ने फिल्मी संगीत को घर-घर पहुंचाकर इसे लोकप्रियता की नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया.
1952 में एक बड़ा मोड़ आया, जब तत्कालीन सूचना एवं प्रसारण मंत्री बी.वी. केसकर ने ऑल इंडिया रेडियो पर फिल्मी गीतों के प्रसारण पर रोक लगा दी. उनका मानना था कि ये गीत पश्चिमी प्रभाव से प्रेरित और अश्लील हैं. लेकिन इस फैसले ने उल्टा असर किया. इसी प्रतिबंध के बाद रेडियो सीलोन का कार्यक्रम बिनाका गीतमाला बेहद लोकप्रिय हुआ और भारतीय फिल्म संगीत को वैश्विक पहचान मिली.
इस स्वर्णिम युग की पहचान बने अमीन सयानी, जिनकी आवाज़ “भाइयों और बहनों” के संबोधन के साथ गूंजती तो पूरा देश रेडियो से जुड़ जाता. उनके कार्यक्रमों ने फिल्मी गीतों को भावनात्मक अनुभव बना दिया. मोहम्मद रफी और लता मंगेशकर जैसे गायकों की लोकप्रियता में रेडियो की बड़ी भूमिका रही. रेडियो ने उन आवाज़ों को उन घरों तक पहुंचाया, जहां सिनेमा हॉल की पहुंच नहीं थी.
रेडियो का जिक्र
आज भी सिनेमा में रेडियो का जिक्र जीवंत रूप में मिलता है. लगे रहो मुन्ना भाई और तुम्हारी सुलू जैसी फिल्मों में रेडियो कहानी का अहम हिस्सा रहा. अभिनेत्री विद्या बालन ने कहा था कि रेडियो एक ऐसा माध्यम है जहां चेहरा नहीं दिखता, लेकिन भावनाएं सीधे दिल तक पहुंचती हैं.
डिजिटल युग और पॉडकास्ट के समय में भी रेडियो का आकर्षण कम नहीं हुआ. गुलज़ार ने कभी कहा था कि रेडियो पर गीत सुनना किसी पुराने दोस्त का पत्र पढ़ने जैसा है. आज भी यादों का इडियट बॉक्स जैसे कार्यक्रम यह साबित करते हैं कि तकनीक बदल सकती है पर आवाज़ और कहानी का जादू हमेशा कायम रहता है.


