पुलवामा के 7 साल: जब वैलेंटाइन डे बना आतंक के खिलाफ संकल्प दिवस, भारत ने 12 दिन में लिया था बदला

14 फरवरी 2019 के पुलवामा हमले में 40 सीआरपीएफ जवान शहीद हुए. इसके बाद भारत ने बालाकोट एयरस्ट्राइक की और अनुच्छेद 370 हटाया. सात साल में आतंक के खिलाफ नीति सख्त हुई और कश्मीर के हालात में बदलाव देखा गया.

Shraddha Mishra

नई दिल्ली: 14 फरवरी 2019… यह तारीख दुनिया के लिए भले ही प्यार का प्रतीक रही हो, लेकिन भारत के लिए यह दिन गहरे दर्द और संकल्प का प्रतीक बन गया है. श्रीनगर-जम्मू राष्ट्रीय राजमार्ग पर पुलवामा के लेथपोरा में हुआ वह भयानक विस्फोट आज भी लोगों की स्मृतियों में ताजा है. उस दिन सीआरपीएफ के 40 जवानों ने देश के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए. सात साल बाद भी यह घटना केवल एक आतंकी हमला नहीं, बल्कि भारत की सुरक्षा नीति में बड़े बदलाव की शुरुआत मानी जाती है.

14 फरवरी 2019 को जैश-ए-मोहम्मद के आत्मघाती हमलावर ने विस्फोटकों से भरी गाड़ी को सीआरपीएफ के काफिले से टकरा दिया. धमाका इतना जोरदार था कि पूरा इलाका दहल उठा. जांच में सामने आया कि इस हमले की साजिश लंबे समय से रची जा रही थी. बताया गया कि इसके मुख्य साजिशकर्ता उमर फारूक ने अफगानिस्तान में आईईडी बनाने का प्रशिक्षण लिया था. उसके साथ इस्माइल अल्वी जैसे आतंकी भी शामिल थे. आत्मघाती हमलावर आदिल डार को तैयार करने में इन लोगों की बड़ी भूमिका थी. हमले के लिए करीब 200 किलो विस्फोटक जुटाया गया था.

भारत की कड़ी प्रतिक्रिया

पुलवामा हमले के बाद देशभर में आक्रोश की लहर दौड़ गई. इसके जवाब में भारत ने कड़ा कदम उठाया. उरी सर्जिकल स्ट्राइक के बाद भारत पहले ही अपनी नई रणनीति का संकेत दे चुका था. लेकिन पुलवामा के बाद भारतीय वायुसेना ने बालाकोट में एयरस्ट्राइक कर आतंकी ठिकानों को निशाना बनाया. करीब पांच दशक बाद पहली बार भारतीय वायुसेना ने दुश्मन देश की सीमा के भीतर जाकर कार्रवाई की. इस कदम ने साफ कर दिया कि आतंकवाद के खिलाफ भारत अब निर्णायक रुख अपना चुका है.

जम्मू-कश्मीर में बदले हालात

हमले के बाद केंद्र सरकार ने जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 के प्रावधान हटाने का फैसला लिया. सरकार का मानना था कि यह कदम अलगाववाद और आतंक के ढांचे को कमजोर करेगा. पिछले कुछ वर्षों में सुरक्षा बलों ने कई बड़े आतंकी कमांडरों को ढेर किया है. स्थानीय स्तर पर आतंकी भर्ती में भी गिरावट आई है. हालांकि बीच-बीच में हमले हुए हैं, लेकिन आम जनजीवन में पहले जैसा भय का माहौल नहीं दिखता.

हमले का मुख्य आरोपी अजहर मसूद अभी भी पाकिस्तान में है. लेकिन उसके कई करीबी साथियों को सुरक्षा बलों ने खत्म कर दिया है. घाटी में सक्रिय जैश के कई कमांडर मारे जा चुके हैं. अब संगठन को स्थानीय समर्थन और नए कैडर जुटाने में मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है.

‘ब्लैक डे’ या संकल्प दिवस?

कुछ लोग 14 फरवरी को काला दिवस मानते हैं, क्योंकि इस दिन 40 जवानों ने सर्वोच्च बलिदान दिया. वहीं कई लोग इसे आतंकवाद के खिलाफ निर्णायक लड़ाई की शुरुआत के रूप में देखते हैं. यह दिन देश को एकजुट होने और शहीदों के सपनों को आगे बढ़ाने का संदेश देता है.

सात साल बाद भी पुलवामा हमला भारत के इतिहास में एक अहम मोड़ के रूप में दर्ज है. इस घटना ने देश की सुरक्षा नीति, कूटनीति और आंतरिक व्यवस्था पर गहरा असर डाला. शहीदों का बलिदान देश के लिए प्रेरणा बन चुका है, और आतंक के खिलाफ लड़ाई अब भी जारी है.

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