काली शॉल, एसआईआर की लड़ाई...जब सुप्रीम कोर्ट पहुंची सीएम ममता बनर्जी तो कैसा था अंदर का माहौल

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी खुद सुप्रीम कोर्ट पहुंचीं और एसआईआर प्रक्रिया पर रोक की मांग की. उन्होंने 150+ मौतों, महिलाओं के नाम हटाने और बंगाल को निशाना बनाने का आरोप लगाया. कोर्ट ने ईसीआई को नोटिस जारी किया और राज्य से अधिकारी तैनाती सुनिश्चित करने को कहा.

Yaspal Singh
Edited By: Yaspal Singh

नई दिल्लीः पश्चिम बंगाल में 2026 के विधानसभा चुनाव नजदीक आ रहे हैं. इस बीच, दिल्ली की सर्द सुबह में राजनीतिक हलचल बढ़ गई जब मुख्यमंत्री ममता बनर्जी खुद सर्वोच्च न्यायालय पहुंचीं. उनका मकसद था चुनाव आयोग की ओर से राज्य में चलाए जा रहे मतदाता सूची के विशेष गहन संशोधन (एसआईआर) पर रोक लगवाना और लोकतंत्र की रक्षा करना.

सुप्रीम कोर्ट में ममता का ऐतिहासिक कदम

ममता बनर्जी अपनी सफेद साड़ी और काले शॉल के साथ कोर्ट पहुंचीं. उन्होंने काला शॉल उन 100 से ज्यादा मौतों के विरोध में पहना था, जो एसआईआर अभियान के दौरान कथित तौर पर हुईं. यह पहला मौका था जब कोई मौजूदा मुख्यमंत्री खुद अदालत में अपना पक्ष रखने आईं. गलियारों में वकील उन्हें देखकर अभिवादन कर रहे थे, कुछ फोटो खींच रहे थे. ममता ने मीडिया से बचते हुए हाथ जोड़कर मुस्कुराईं और अदालत कक्ष में प्रवेश किया.

शुरुआत में उन्हें याचिकाकर्ता की पहली पंक्ति में बैठने को कहा गया, लेकिन वे अपने वकील के साथ पीछे दर्शकों की सीट पर बैठी रहीं. सुरक्षा के सख्त इंतजाम थे, सेल्फी लेने वालों के फोन तक जब्त किए गए. कोर्ट रूम नंबर 1 खचाखच भरा था, क्योंकि यह मामला पूरे देश की नजर में था.

अदालत में ममता की भावुक दलीलें

दोपहर करीब 12:45 बजे सुनवाई शुरू हुई. ममता टीएमसी सांसद और वरिष्ठ वकील कल्याण बनर्जी के साथ पहली पंक्ति में आ गईं. छोटे कद की ममता ने अपनी मौजूदगी से पूरे कोर्ट रूम में जोश भर दिया. उन्होंने मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और विपुल एम पंचोली की पीठ से पश्चिम बंगाल में लोकतंत्र बचाने की अपील की.

शुरुआत में उन्होंने अपने वकीलों को बोलने दिया, लेकिन जब चुनाव आयोग के वकील ने दावा किया कि नाम सिर्फ छोटी वर्तनी गलतियों से नहीं हटाए जा रहे, तो ममता ने प्रोटोकॉल तोड़ते हुए हस्तक्षेप की इजाजत मांगी. हाथ जोड़कर उन्होंने कहा कि वकील मुकदमा लड़ते हैं, लेकिन जब न्याय नहीं मिलता तो न्याय बंद दरवाजों के पीछे रोता है. मैं रवींद्रनाथ टैगोर के शब्दों को याद कर रही हूं.

ममता ने बताया कि उन्होंने ईसीआई को छह पत्र लिखे, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला. मुख्य न्यायाधीश ने पूछा कि राज्य के पास बेहतरीन वकील हैं, फिर खुद क्यों आईं? ममता ने जवाब दिया कि मैं एक आम आदमी की तरह यहां हूं, बंधुआ मजदूर परिवार से हूं, बंगाल की बेटी हूं.

एसआईआर पर गंभीर आरोप

ममता ने कहा कि एसआईआर का इस्तेमाल सिर्फ नाम हटाने के लिए हो रहा है, न कि सत्यापन के लिए. बंगाली भाषा न समझने वाले सूक्ष्म पर्यवेक्षकों द्वारा नाम हटाए जा रहे हैं. शादी के बाद महिलाओं के उपनाम बदलने या काम के सिलसिले में पते बदलने को तार्किक विसंगति बताकर हटाया जा रहा है. उन्होंने पूछा कि बंगाल को ही क्यों निशाना बनाया जा रहा? असम या पूर्वोत्तर से क्यों नहीं शुरू किया?"

उन्होंने 150 से ज्यादा मौतों का जिक्र किया, खासकर बीएलओ की, जो दबाव में कथित तौर पर आत्महत्या कर ली. फसल कटाई और पूजा के मौसम में नोटिस जारी करना अनुचित बताया. आधार कार्ड जैसी दस्तावेजों को पहले कोर्ट के आदेश पर स्वीकार किया जाना था, लेकिन अब इनकार किया जा रहा है. चुनाव आयोग के वकील ने राज्य पर असहयोग का आरोप लगाया, तो ममता ने खारिज कर दिया कि राज्य ने सभी अधिकारी उपलब्ध कराए हैं.

कोर्ट का फैसला

सुनवाई के अंत में मुख्य न्यायाधीश ने ईसीआई को नोटिस जारी किया और राज्य को सत्यापन के लिए पर्याप्त अधिकारी तैनात करने का निर्देश दिया. ममता ने तुरंत सहमति जताई. कोर्ट ने नाम की छोटी गलतियों पर नोटिस जारी करने में सावधानी बरतने को कहा.सुनवाई बाद ममता को वकील और मीडिया ने घेर लिया. कुछ ने किताब भेंट की. सोशल मीडिया पर वीडियो वायरल हुए, जहां वकील उनकी कार तक पीछा करते दिखे.
 

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