अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा और फैसला होने तक लोकसभा नहीं जाऊंगा...स्पीकर ओम बिरला का बड़ा बयान

लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने यह फैसला किया है कि वह बजट सत्र के दूसरे चरण के दौरान लोकसभा में तब तक नहीं जाएंगे जब तक विपक्ष द्वारा लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा और फैसला नहीं हो जाता.

Utsav Singh
Edited By: Utsav Singh

नई दिल्ली : भारतीय संसदीय लोकतंत्र के इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ तब आया जब लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने सदन की कार्यवाही से स्वयं को अलग रखने का फैसला किया. विपक्ष द्वारा उन्हें पद से हटाने हेतु लाए गए अविश्वास प्रस्ताव के बाद उन्होंने यह नैतिक रुख अपनाया है. हालांकि नियम उन्हें आने से नहीं रोकते, लेकिन बिरला ने अपनी निष्पक्षता सिद्ध करने हेतु यह कदम उठाया. अब 9 मार्च को होने वाली इस ऐतिहासिक चर्चा पर समूचे राष्ट्र की नजरें टिकी हुई हैं.

ओम बिरला का कड़ा फैसला

लोकसभा अध्यक्ष ने स्पष्ट किया है कि जब तक उनके विरुद्ध लाए गए प्रस्ताव पर सदन में पूरी चर्चा होकर कोई ठोस निर्णय नहीं आ जाता, वे कार्यवाही में शामिल नहीं होंगे. सूत्रों के अनुसार, उन्होंने यह निर्णय संसदीय शुचिता बनाए रखने के उद्देश्य से लिया है. यद्यपि सत्ता पक्ष और कुछ विपक्षी सदस्य उन्हें मनाने का प्रयास कर सकते हैं, परंतु बिरला का स्टैंड पूरी तरह अडिग है. वे चाहते हैं कि उनके आचरण पर चर्चा के दौरान वे स्वयं वहां उपस्थित न रहें.

आगामी चर्चा की रणनीति

संसदीय विशेषज्ञों का मानना है कि बजट सत्र के दूसरे भाग के पहले ही दिन यानी 9 मार्च को इस प्रस्ताव पर बहस हो सकती है. नियमों के मुताबिक, इस प्रक्रिया को शुरू करने के लिए सदन में कम से कम 50 सांसदों का खड़े होकर समर्थन जताना अनिवार्य है. यदि यह आंकड़ा प्राप्त हो जाता है, तो पीठासीन अधिकारी उसी दिन अविश्वास प्रस्ताव पर विधिवत चर्चा की अनुमति दे सकते हैं. यह सत्र सरकार और विपक्ष के बीच एक बड़ी शक्ति परीक्षा होने वाला है.

विपक्ष के तीखे आरोप

कांग्रेस ने लोकसभा सचिव को सौंपे गए अपने नोटिस में स्पीकर पर सदन के संचालन के दौरान पक्षपातपूर्ण रवैया अपनाने के गंभीर आरोप लगाए हैं. विपक्षी दलों का तर्क है कि सदन की कार्यवाही के दौरान उनके नेताओं को बोलने का उचित अवसर नहीं दिया गया. राहुल गांधी और अन्य विपक्षी सांसदों को राष्ट्रपति के अभिभाषण पर चर्चा के समय अपनी बात रखने से रोकने को लोकतंत्र पर प्रहार बताया गया है. साथ ही, आठ सांसदों के निलंबन को भी अविश्वास का मुख्य कारण बनाया गया.

राहुल गांधी के हस्ताक्षर का रहस्य

इस अविश्वास प्रस्ताव में एक रणनीतिक मोड़ तब देखा गया जब यह स्पष्ट हुआ कि नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने इस नोटिस पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं. कांग्रेस पार्टी का कहना है कि संसदीय मर्यादा के तहत नेता प्रतिपक्ष का स्पीकर को हटाने वाले प्रस्ताव पर साइन करना उचित नहीं माना जाता. गौरव गोगोई ने नियम 94सी के अंतर्गत यह नोटिस दोपहर को सौंपा था. समाजवादी पार्टी, डीएमके और आरजेडी सहित विभिन्न दलों के 118 सांसदों ने इस प्रस्ताव पर अपनी लिखित सहमति प्रदान की है.

सचिव जनरल द्वारा जांच के निर्देश

अविश्वास प्रस्ताव के नोटिस मिलने के तुरंत बाद ओम बिरला ने लोकतांत्रिक परंपराओं का पालन करते हुए लोकसभा सचिव जनरल उत्पल कुमार सिंह को मामले की गहन जांच करने के निर्देश दिए हैं. यह संवैधानिक प्रक्रिया अनुच्छेद 94(सी) के प्रावधानों के अंतर्गत पूरी की जा रही है. अध्यक्ष का यह कदम दर्शाता है कि वे नियमों के प्रति पूरी तरह प्रतिबद्ध हैं. वर्तमान में विपक्ष की इस एकजुटता ने सदन के आगामी दिनों के कामकाज और राजनैतिक समीकरणों को पूरी तरह से बदल कर रख दिया है.

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