भारत-यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौता: वर्षों की बातचीत के बाद बनी सहमति, क्या-क्या लगा दांव पर?

भारत-ईयू मुक्त व्यापार समझौता अंतिम चरण में है. शिखर सम्मेलन में इसकी घोषणा संभव है. इससे व्यापार बढ़ेगा, भारत के निर्यात को लाभ और ईयू को भारतीय बाजार तक बेहतर पहुंच मिलेगी, हालांकि टैरिफ, सेवाएं और नियम अब भी चुनौती बने हुए हैं.

Yaspal Singh
Edited By: Yaspal Singh

नई दिल्लीः भारत और यूरोपीय संघ (ईयू) के बीच लंबे समय से लंबित मुक्त व्यापार समझौता (एफटीए) अब अंतिम चरण में पहुंचता दिख रहा है. उम्मीद की जा रही है कि नई दिल्ली में आयोजित भारत-ईयू शिखर सम्मेलन के दौरान इस महत्वपूर्ण व्यापार समझौते को लेकर औपचारिक घोषणा की जा सकती है. यह समझौता दोनों पक्षों के आर्थिक रिश्तों को नई दिशा देने वाला माना जा रहा है.

समझौते की पुष्टि 

समझौते पर हस्ताक्षर के बाद इसे यूरोपीय संसद से मंजूरी मिलनी होगी, जिसमें कम से कम एक वर्ष का समय लग सकता है. इसके बाद यह एफटीए भारत और यूरोपीय संघ के बीच व्यापार को गति देगा. खासतौर पर भारतीय वस्त्र, परिधान और आभूषण जैसे निर्यात क्षेत्रों को इससे बड़ा फायदा मिलने की उम्मीद है, जो हाल के महीनों में ऊंचे अमेरिकी शुल्कों से प्रभावित रहे हैं.

हालांकि, यूरोपीय संघ के भीतर संसदीय प्रक्रियाएं इस समझौते के रास्ते में चुनौती बन सकती हैं. हाल ही में ईयू सांसदों द्वारा एक अन्य व्यापार समझौते को अदालत में चुनौती देने का फैसला इस ओर संकेत करता है कि अनुमोदन प्रक्रिया आसान नहीं होगी.

अभी क्यों अहम है यह समझौता

वैश्विक स्तर पर बढ़ते संरक्षणवाद के बीच यह समझौता भारत के लिए बेहद महत्वपूर्ण है. यह चार वर्षों में भारत का नौवां व्यापार समझौता होगा, जो यह दर्शाता है कि नई दिल्ली वैश्विक बाजारों तक पहुंच बनाए रखने के लिए सक्रिय रणनीति अपना रही है. वहीं, यूरोपीय संघ के लिए यह समझौता चीन पर निर्भरता कम करने और भारत जैसी तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था से जुड़ने का अवसर है.

भारत को होने वाले प्रमुख लाभ

यूरोपीय संघ भारत के शीर्ष व्यापारिक साझेदारों में शामिल है. हालिया आंकड़ों के अनुसार, दोनों के बीच वस्तुओं और सेवाओं का व्यापार 190 अरब डॉलर से अधिक का है. हालांकि ईयू का औसत टैरिफ अपेक्षाकृत कम है, लेकिन कपड़ा और परिधान जैसे श्रम-प्रधान क्षेत्रों पर शुल्क ज्यादा है.

एफटीए लागू होने से इन क्षेत्रों की प्रतिस्पर्धात्मक स्थिति मजबूत होगी. इसके अलावा भारत आईटी सेवाओं, पेशेवरों की आवाजाही और सेवा निर्यात में भी बेहतर पहुंच की मांग कर रहा है.

यूरोपीय संघ के लिए अवसर

भारत में यूरोपीय संघ से आने वाले उत्पादों पर अपेक्षाकृत ऊंचे शुल्क लगाए जाते हैं. खासकर ऑटोमोबाइल, ऑटो पार्ट्स, रसायन और प्लास्टिक जैसे क्षेत्रों में. यदि शुल्क कम होते हैं, तो ईयू कंपनियों को भारत के तेजी से बढ़ते बाजार में नए अवसर मिल सकते हैं. इसके साथ ही सेवाओं, निवेश और सरकारी खरीद तक बेहतर पहुंच भी संभव होगी.

विवाद और संवेदनशील मुद्दे

इस समझौते में कृषि और डेयरी क्षेत्र को बाहर रखा गया है. भारत, अधिकांश उत्पादों पर पूरी तरह शुल्क समाप्त करने के ईयू प्रस्ताव से सहमत नहीं है. ऑटोमोबाइल और शराब जैसे क्षेत्रों में भारत चरणबद्ध शुल्क कटौती या सीमित कोटा के पक्ष में है, ताकि घरेलू उद्योग को नुकसान न पहुंचे.

नियम, सेवाएं और भारत की चिंताएं

भारत यूरोपीय संघ से डेटा सुरक्षा दर्जा, पेशेवरों की आसान आवाजाही और सामाजिक सुरक्षा से जुड़ी राहत चाहता है. वहीं ईयू श्रम, पर्यावरण और बौद्धिक संपदा नियमों पर सख्त प्रतिबद्धताओं की मांग कर रहा है. भारत की बड़ी चिंता ईयू का कार्बन सीमा शुल्क और अन्य गैर-टैरिफ बाधाएं हैं, जो संभावित लाभ को कम कर सकती हैं.

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