मालेगांव ब्लास्ट केस: बॉम्बे हाईकोर्ट ने अंतिम 4 आरोपियों को किया बरी, जांच एजेंसियों पर उठाए गंभीर सवाल

मालेगांव ब्लास्ट केस में बॉम्बे हाईकोर्ट के बड़े फैसले ने जांच एजेंसियों की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. अदालत ने विरोधाभासी जांच और ठोस सबूतों की कमी के आधार पर अंतिम चार आरोपियों को बरी कर दिया.

Yogita Pandey
Edited By: Yogita Pandey

नई दिल्ली: 2006 के मालेगांव बम विस्फोट मामले में बॉम्बे हाईकोर्ट ने बुधवार को बड़ा फैसला सुनाते हुए अंतिम चार आरोपियों को बरी कर दिया. अदालत ने महाराष्ट्र एटीएस और राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) की जांच में पाए गए गंभीर विरोधाभासों को आधार बनाते हुए कहा कि दोनों एजेंसियों की जांच में कोई सामंजस्य नहीं है.

हाईकोर्ट ने यह भी टिप्पणी की कि इस केस में जांच की दिशा दो अलग-अलग रास्तों पर चलती रही, जिससे सच्चाई तक पहुंचना मुश्किल हो गया. अदालत के इस फैसले के बाद अब इस मामले में कोई भी आरोपी ट्रायल का सामना नहीं करेगा.

हाईकोर्ट ने क्या कहा

मुख्य न्यायाधीश चंद्रशेखर और न्यायमूर्ति श्याम सी. चांडक की पीठ ने विशेष एनआईए अदालत के 30 सितंबर 2025 के आदेश को खारिज कर दिया.

अदालत ने कहा कि निचली अदालत के आदेश में न्यायिक विवेक का पर्याप्त उपयोग नहीं दिखता और वह संतोषजनक नहीं है.

किन आरोपियों को मिली राहत

हाईकोर्ट के इस फैसले के बाद मनोहर नरवरिया, राजें   द्र चौधरी, धन सिंह और लोकेश शर्मा को आरोपों से मुक्त कर दिया गया. ये सभी 2019 से जमानत पर थे.

इससे पहले, 2016 में विशेष अदालत नौ अन्य मुस्लिम आरोपियों को भी बरी कर चुकी थी, जिन्हें शुरुआत में एटीएस ने गिरफ्तार किया था.

जांच में नहीं मिले ठोस सबूत

अदालत ने अपने फैसले में यह सवाल उठाया कि 2011 में जांच अपने हाथ में लेने के बाद एनआईए कोई नया ठोस सबूत क्यों नहीं जुटा सकी.

कोर्ट के मुताबिक, एनआईए ने उन गवाहों और बयानों पर भरोसा किया, जिन्हें बाद में वापस ले लिया गया था.

असीमानंद के बयान पर भी टिप्पणी

एनआईए ने अपने केस में स्वामी असीमानंद के 2010 के बयान का हवाला दिया था, जिसे उन्होंने बाद में वापस ले लिया था.

हाईकोर्ट ने स्पष्ट कहा कि जो गवाह अपने बयान से पलट जाता है, उसकी गवाही भरोसेमंद नहीं मानी जा सकती.

एटीएस और एनआईए की जांच में टकराव

अदालत ने पाया कि एटीएस और एनआईए द्वारा पेश किए गए तथ्यों में गंभीर विरोधाभास हैं.

पीठ ने कहा, "एटीएस और एनआईए द्वारा पेश की गई दोनों कहानियों का किसी भी तरह मिलन संभव नहीं है. ये एक-दूसरे के बिल्कुल विपरीत हैं."

दो अलग-अलग जांचों पर सवाल

कोर्ट ने यह भी सवाल उठाया कि एक ही मामले में दो अलग-अलग जांच एजेंसियां अलग-अलग आरोपियों के खिलाफ सबूत कैसे पेश कर सकती हैं.

फैसले में कहा गया, "आज की स्थिति में जांच दो विरोधाभासी दिशाओं में खड़ी है, जिसका कोई अंत नजर नहीं आता."

घटनास्थल से जुड़ा कोई प्रत्यक्ष सबूत नहीं

अदालत ने यह भी गौर किया कि एनआईए के पास ऐसा कोई प्रत्यक्ष गवाह नहीं था, जिसने घटनास्थल पर इन चारों आरोपियों की पहचान की हो.

अधिकांश गवाह केवल सुनी-सुनाई बातों पर आधारित थे, जो अदालत में ठोस साक्ष्य के रूप में स्वीकार्य नहीं माने गए.

क्या था पूरा मामला

8 सितंबर 2006 को महाराष्ट्र के मालेगांव में एक मस्जिद और कब्रिस्तान के पास हुए बम विस्फोटों में 31 लोगों की मौत हुई थी.

शुरुआत में एटीएस और सीबीआई ने नौ मुस्लिम युवकों को आरोपी बनाया था, लेकिन बाद में एनआईए ने जांच की दिशा बदलते हुए एक हिंदू दक्षिणपंथी समूह की संलिप्तता का दावा किया.

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