मुंबई की डेमोग्राफी बदलने का गंदा खेल, अवैध बस्तियां वैध करके वोट बैंक बढ़ाने वालों की खुली पोल!

मुंबई की राजनीति में हलचल तेज है. महाविकास आघाड़ी पर आरोप लगा हैं कि उनकी नीतियां एक विशेष समुदाय को बढ़ावा दे रही हैं, जिससे मुंबई की मूल संस्कृति और पहचान खतरे में पड़ सकती है.

Sonee Srivastav

मुंबई: मुंबई, जो देश की आर्थिक राजधानी है, इन दिनों राजनीतिक उथल-पुथल से गुजर रही है. चुनाव करीब आते ही शहर की जनसंख्या में हो रहे बदलावों पर बहस छिड़ गई है. महाविकास आघाड़ी (एमवीए) पर आरोप हैं कि उनकी नीतियां एक विशेष समुदाय को बढ़ावा दे रही हैं, जिससे मुंबई की मूल संस्कृति और पहचान खतरे में पड़ सकती है. शहरवासी अब सोचने पर मजबूर हैं कि क्या यह वोट बैंक की राजनीति है या शहर को नियंत्रित करने की कोशिश?

अवैध बस्तियों को कानूनी जामा पहनाने का खेल

मुंबई के बेहरामपाड़ा, मालवणी और कुर्ला जैसे क्षेत्रों में अनधिकृत झुग्गियां तेजी से फैल रही है. एमवीए सरकार पर आरोप है कि उन्होंने झुग्गी पुनर्वास योजना के नाम पर इन बस्तियों को वैध बनाने की कोशिश की. आलोचक इसे प्रशासनिक सुधार नहीं, बल्कि राजनीतिक चाल बताते हैं.

उनका कहना है कि इससे एक खास समुदाय का वोट बैंक मजबूत होगा और शहर की जनसांख्यिकी बदल जाएगी. इससे चुनावी नतीजों पर लंबा असर पड़ सकता है और मुंबई की प्लानिंग प्रभावित होगी।

मराठी अस्मिता पर खतरा 

मुंबई में मराठी भाषा लोगों की पहचान पर लंबे समय से राजनीति होती आई है. अब उद्धव बालासाहेब ठाकरे (यूबीटी) गुट पर आरोप लग रहे हैं कि उन्होंने मराठी समाज को शहर से बाहर धकेला और वोटों के लिए बांग्लादेशी व रोहिंग्या जैसे अवैध प्रवासियों को जगह दी. बढ़ती महंगाई और मकानों की ऊंची कीमतों से मध्यम वर्ग मराठी लोग ठाणे, कल्याण जैसे इलाकों में शिफ्ट हो गए हैं. 

वहीं, अवैध घुसपैठ राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए चिंता का विषय बन गई है. अगर इन प्रवासियों को राशन या आधार कार्ड जैसे दस्तावेज मिलते हैं, तो यह सिर्फ राजनीति नहीं, बल्कि देश की सुरक्षा से खिलवाड़ है. विरोधी इसे "वोट जिहाद" की संज्ञा दे रहे हैं. 

प्रतीकात्मक राजनीति और विवादास्पद फैसले

मुंबई के महापौर पद पर मुस्लिम उम्मीदवार को लेकर बहस तेज है. कुछ इसे समावेशी बताते हैं, तो अन्य तुष्टिकरण कहते हैं. एमवीए के समय में याकूब मेमन की कब्र का सौंदर्यीकरण और अजान प्रतियोगिताओं जैसे कदमों पर विवाद हुआ था.

आलोचक कहते हैं कि ऐसे फैसले कट्टरता को बढ़ावा देते हैं. महापौर का पद कौन संभालेगा, इससे ज्यादा उसकी मंशा पर सवाल है. यह राजनीति हिंदू समाज को बांटने और मुस्लिम वोटों को एकजुट करने का खेल लगता है.

दोहरी राजनीति का खतरा

राजनीतिक विशेषज्ञों का कहना है कि सत्ता पाने के लिए दोतरफा रणनीति चल रही है. हिंदू वोटों को जाति, भाषा और क्षेत्रीय मुद्दों पर बांटा जा रहा है, जबकि अल्पसंख्यकों को डर दिखाकर या तुष्टिकरण से एकजुट किया जा रहा है. यह प्रवृत्ति सिर्फ मुंबई तक नहीं, बल्कि पूरे महाराष्ट्र की राजनीति को प्रभावित कर रही है. मुंबई की मूल पहचान भारतीय और मराठी संस्कृति पर टिकी है, लेकिन स्वार्थी राजनीति से यह खतरे में है.

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