दिल्ली-गुरुग्राम जैसे शहरों में अकेलेपन से लड़ने का नया ट्रेंड, किराये पर मिल रहे हैं 'संगी-साथी'

तेज रफ्तार शहरी जीवन में बढ़ते अकेलेपन ने ‘लोनलीनेस इकॉनमी’ को जन्म दिया है. लोग अब भावनात्मक जुड़ाव और खुली बातचीत के लिए भुगतान कर रहे हैं, जिससे ऑफलाइन इंसानी संवाद की अहमियत फिर सामने आई है.

Shraddha Mishra

तेज रफ्तार जीवन, बदलती जीवनशैली और बढ़ती व्यस्तताओं के बीच अकेलापन अब सिर्फ एक व्यक्तिगत या मानसिक समस्या नहीं रह गया है. यह धीरे-धीरे एक नए तरह के बाजार का रूप ले रहा है, जिसे विशेषज्ञ ‘लोनलीनेस इकॉनमी’ कह रहे हैं. देश के बड़े शहरों में लोग अब अपने अकेलेपन को दूर करने के लिए किराये पर संगी-साथी की तलाश कर रहे हैं. 

दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु, गुरुग्राम और कोलकाता जैसे महानगरों में कई स्टार्ट-अप और सोशल प्लेटफॉर्म सामने आए हैं, जो लोगों को बातचीत, साथ बैठने और सामाजिक जुड़ाव के मौके उपलब्ध करा रहे हैं. इन सेवाओं के लिए लोग पेमेंट करने को भी तैयार हैं. इसका मकसद डेटिंग नहीं, बल्कि खुलकर अपनी बात कहना और दूसरों को सुनना है.  

इंसानी बातचीत की ओर वापसी

विशेषज्ञों का मानना है कि सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म ने लोगों को जुड़े रहने का अहसास तो दिया है, लेकिन आमने-सामने की बातचीत कम होती चली गई है. लगातार मोबाइल और स्क्रीन पर रहने से भावनात्मक दूरी बढ़ी है. नौकरी या पढ़ाई के कारण शहर बदलना, परिवार से दूर रहना और सीमित मित्रता का दायरा इस समस्या को और गहरा कर रहा है.

सामाजिक विश्लेषकों के अनुसार, यह नया चलन इस बात का संकेत है कि लोग अब केवल लाइक्स, मैसेज और ऑनलाइन चैट से संतुष्ट नहीं हैं. वे वास्तविक इंसानी संवाद चाहते हैं. ऐसे ऑफलाइन मीटअप और संवाद सत्रों में लोग बिना किसी दबाव के अपने जीवन, रिश्तों, डर और भावनाओं पर खुलकर बात कर पाते हैं. यही वजह है कि इन आयोजनों की लोकप्रियता लगातार बढ़ रही है.

मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ता है असर

महानगरों में अकेले रहने वाले कई लोग लंबे समय तक अकेलेपन से जूझते रहते हैं. विशेषज्ञों का कहना है कि यह स्थिति धीरे-धीरे गंभीर मानसिक समस्याओं का रूप ले सकती है. खासकर छोटे शहरों और गांवों से काम या पढ़ाई के लिए आए लोग डिप्रेशन और तनाव के शिकार हो सकते हैं. ऐसे में संवाद और सामाजिक जुड़ाव मानसिक स्वास्थ्य के लिए जरूरी बन गया है.

इस उभरती ‘लोनलीनेस इकॉनमी’ से साफ है कि लोग अब ऑफलाइन जुड़ाव की तलाश में हैं. वे ऐसी जगह चाहते हैं, जहां बिना किसी जजमेंट के बात की जा सके. यहां उद्देश्य सिर्फ समय बिताना नहीं, बल्कि भावनात्मक जुड़ाव बनाना होता है.

सुरक्षा और भरोसे पर खास ध्यान

इन आयोजनों में सुरक्षा को सबसे ऊपर रखा जाता है. प्रतिभागियों की संख्या सीमित होती है, ताकि बातचीत सहज रहे. प्रवेश के लिए टिकट व्यवस्था होती है, जिससे केवल गंभीर लोग ही हिस्सा लें. कई प्लेटफॉर्म स्क्रीनिंग कॉल, पहचान सत्यापन और पृष्ठभूमि जांच भी करते हैं. डेटिंग को अक्सर सख्ती से प्रतिबंधित रखा जाता है, ताकि माहौल सुरक्षित और सम्मानजनक बना रहे.

कुल मिलाकर, यह नया सामाजिक चलन दिखाता है कि आधुनिक जीवन में इंसानी रिश्तों और बातचीत की अहमियत पहले से कहीं ज्यादा बढ़ गई है. अकेलापन अब सिर्फ समस्या नहीं, बल्कि समाज के लिए एक चेतावनी भी है, जिसे समझना और संभालना जरूरी हो गया है.

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