बजट दिवस पर निर्मला सीतारमण का खास संदेश, कांचीपुरम साड़ी में दिखी तमिलनाडु की बुनाई विरासत

बजट दिवस पर केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने एक बार फिर अपने पहनावे के जरिए भारतीय हथकरघा को सम्मान दिया. कांचीपुरम रेशम की साड़ी में उनका यह अंदाज तमिलनाडु की सदियों पुरानी बुनाई विरासत का प्रतीक बना.

Yogita Pandey
Edited By: Yogita Pandey

नई दिल्ली: केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने बजट दिवस पर एक बार फिर अपने पहनावे के जरिए भारतीय हथकरघा परंपरा को सम्मान दिया. लगातार नौवीं बार केंद्रीय बजट पेश करने के दिन वह कर्तव्य भवन हाथ से बुनी कांचीपुरम रेशम की साड़ी पहनकर पहुंचीं, जिसने तमिलनाडु की सदियों पुरानी बुनाई कला को राष्ट्रीय मंच पर रेखांकित किया.

गहरे मैरून-बरगंडी रंग की इस साड़ी पर बारीक चेकर्ड बुनाई थी, जबकि बॉर्डर और पल्लू का रंग गहरा बैंगनी या वाइन शेड में नजर आया. यह संयोजन साड़ी को गंभीर, गरिमामय और राजसी आभा देता दिखा, जो बजट जैसे महत्वपूर्ण अवसर के अनुरूप था.

दिखावे से दूर, अर्थपूर्ण चयन

निर्मला सीतारमण का यह कांचीपुरम लुक सुर्खियां बटोरने के लिए नहीं, बल्कि अवसर की गरिमा को निभाने के लिए चुना गया प्रतीत हुआ. गहरे रंग की यह कांचीपुरम रेशमी साड़ी भव्य होने के साथ-साथ संयमित भी थी, जिसकी खूबसूरती इसके दिखावे में नहीं बल्कि इसकी बनावट और कारीगरी में झलक रही थी.

नीति, जवाबदेही और दूरदर्शी सोच से जुड़े इस दिन पर यह साड़ी केवल परिधान नहीं, बल्कि अवसर का एक स्वाभाविक हिस्सा नजर आई -गंभीर, स्थायी और सम्मानजनक.

बजट दिवस की वेशभूषा में सादगी की परंपरा

सीतारमण के बजट दिवस के पहनावे में कभी भी आडंबर नहीं दिखता. इसके बजाय, उनके परिधान संस्थानों, शिल्प परंपराओं और भारत के वस्त्र उद्योग से जुड़े समुदायों के प्रति सम्मान की एक सुसंगत भाषा बोलते हैं. हर बार उनका चयन एक शांत लेकिन मजबूत सांस्कृतिक संदेश देता है.

कांचीपुरम रेशम की चार सौ साल पुरानी विरासत

चार शताब्दियों से अधिक समय से तमिलनाडु में बुनी जा रही कांचीपुरम रेशमी साड़ियाँ भारत की सबसे प्रतिष्ठित हथकरघा परंपराओं में गिनी जाती हैं. शुद्ध शहतूत रेशम, असली ज़री बॉर्डर और वास्तुशिल्पीय रूपांकनों के लिए प्रसिद्ध ये साड़ियाँ पारंपरिक रूप से शादियों, धार्मिक समारोहों और महत्वपूर्ण अवसरों पर पहनी जाती हैं.

मंदिरों से प्रेरित पैटर्न, चेक डिज़ाइन और कंट्रास्ट बॉर्डर इस क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान को दर्शाते हैं. कांचीपुरम साड़ी पहनना मानो इतिहास, आस्था और कला को एक साथ धारण करने जैसा है.

कांचीपुरम और कांचीवरम: नाम अलग, परंपरा एक

कांचीपुरम और कांचीवरम शब्दों का प्रयोग अक्सर एक-दूसरे के स्थान पर किया जाता है. कांचीपुरम तमिलनाडु के उस मंदिर नगर का औपचारिक भौगोलिक नाम है, जहां यह बुनाई परंपरा जन्मी, जबकि कांचीवरम या कांजीवरम इसका प्रचलित व्यावसायिक नाम है.

हालांकि नाम अलग हो सकते हैं, लेकिन बुनाई की तकनीक, रेशम की गुणवत्ता और ज़री की कारीगरी दोनों में समान रहती है—शुद्ध शहतूत रेशम, सुनहरी ज़री और विशिष्ट कंट्रास्ट बॉर्डर. फर्क सिर्फ नाम का है, प्रामाणिकता का नहीं.

तमिलनाडु से निजी जुड़ाव का प्रतीक

निर्मला सीतारमण के लिए यह चयन व्यक्तिगत स्तर पर भी मायने रखता है. तमिलनाडु उनका गृह राज्य है और कांचीपुरम रेशम साड़ियाँ राज्य की सबसे विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान मानी जाती हैं. राष्ट्रीय मंच पर इस हस्तनिर्मित साड़ी को पहनना उस विरासत को सम्मान देने जैसा है.

कपड़ों के ज़रिए कहानी कहने की शैली

पिछले कुछ वर्षों में सीतारमण की बजट दिवस की वेशभूषा वस्त्रों के माध्यम से कहानी कहने का एक अनूठा तरीका बन गई है. हर साड़ी किसी न किसी क्षेत्र, शिल्प या बुनाई परंपरा को उजागर करती है, जिससे भारत के हथकरघा उद्योग को बिना दिखावे के निरंतर दृश्यता मिलती है.कांचीपुरम साड़ी ने न तो भाषण से प्रतिस्पर्धा की और न ही माहौल से वह बस उसका साथ देती नजर आई.

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