टैंकों पर लटकी जंजीरें क्यों दुश्मन की सबसे बड़ी नींद उड़ाने वाली सच्चाई बन गईं
77वें गणतंत्र दिवस की परेड में टैंकों पर दिखीं जंजीरें चर्चा का विषय बन गईं. ये सिर्फ सजावट नहीं, बल्कि युद्ध में दुश्मन की सबसे खतरनाक चाल को बेअसर करने की रणनीति हैं. इसको आम आदमी नहीं समझ सकता है पर सैना को पता है ये रणनीति कितनी जरूरी है

26 जनवरी 2026 को कर्तव्य पथ पर जब सेना के टैंक आगे बढ़े तो लोगों की नजर उनके पिछले हिस्से में लटकी भारी जंजीरों पर टिक गई. पहली नजर में ये आम चीज लगीं लेकिन सैन्य जानकारों के लिए यह साफ संकेत था. यह परेड सिर्फ शक्ति प्रदर्शन नहीं थी बल्कि भविष्य की जंग का संदेश भी थी. आज की लड़ाइयां पुराने तरीके से नहीं लड़ी जातीं. अब दुश्मन सामने से नहीं बल्कि ऊपर से वार करता है. ड्रोन और रॉकेट सबसे बड़ा खतरा बन चुके हैं. ऐसे में सेना ने टैंक की सुरक्षा का तरीका भी बदला है. यही वजह है कि जंजीरें आज टैंक का अहम हिस्सा बन गई हैं.
क्या जंजीरें टैंक की ढाल हैं?
टैंक पर लगी ये जंजीरें सीधी भाषा में कहें तो चलती फिरती ढाल हैं. जब कोई ड्रोन या रॉकेट टैंक के पास आता है तो वह पहले इन जंजीरों से टकराता है. इससे विस्फोट की दिशा बदल जाती है. कई बार धमाका टैंक से पहले ही हो जाता है. इससे टैंक को सीधा नुकसान नहीं पहुंचता. अंदर बैठे जवान सुरक्षित रहते हैं. युद्ध में कुछ सेकंड और कुछ इंच की दूरी जान बचा लेती है. यही काम ये जंजीरें करती हैं.
ड्रोन युद्ध में क्यों जरूरी हुईं?
आज की जंग में ड्रोन सबसे सस्ता और घातक हथियार बन गया है. दुश्मन दूर बैठकर हमला करता है. ड्रोन ऊपर से टैंक के कमजोर हिस्से को निशाना बनाते हैं. ऐसे हमलों से बचना पहले मुश्किल था. जंजीरें ड्रोन के सटीक वार को बिगाड़ देती हैं. ड्रोन का हमला जंजीरों से उलझकर बेअसर हो जाता है. कई बार ड्रोन समय से पहले फट जाता है. यही कारण है कि आधुनिक सेनाएं इस तकनीक को तेजी से अपना रही हैं.
क्या दुनिया पहले से कर रही है इस्तेमाल?
यह तरीका नया नहीं है लेकिन अब इसका महत्व बढ़ गया है. रूस और यूक्रेन युद्ध में यह तकनीक खुलकर सामने आई. दोनों देशों के टैंकों पर ऐसी जंजीरें देखी गईं. इजराइल की सेना भी सालों से अपने टैंकों में यह सुरक्षा इस्तेमाल कर रही है. युद्ध के अनुभव से यह साबित हुआ है कि यह सस्ता लेकिन असरदार तरीका है. भारी तकनीक के साथ छोटे उपाय भी काम आते हैं. भारत ने भी इन्हीं अनुभवों से सीख ली है.
भारतीय सेना ने क्या संदेश दिया?
गणतंत्र दिवस परेड में ऐसी जंजीरें दिखाना कोई संयोग नहीं था. यह दुश्मन के लिए साफ चेतावनी थी. सेना यह बताना चाहती थी कि वह बदलती जंग के लिए तैयार है. भारत अब पुराने युद्ध के भरोसे नहीं बैठा है. हर खतरे का जवाब खोजा जा चुका है. टैंक सिर्फ ताकत नहीं बल्कि समझदारी का भी प्रतीक बन चुका है. यह संदेश देश के भीतर और बाहर दोनों के लिए था.
क्या टैंक अब पहले से ज्यादा सुरक्षित हैं?
इस बार परेड में टी-90 भीष्म और अर्जुन जैसे आधुनिक टैंक नजर आए. इन टैंकों पर लगी जंजीरें उनकी सुरक्षा को और मजबूत बनाती हैं. इसका मतलब यह नहीं कि टैंक अजेय हो गए हैं. लेकिन खतरा काफी हद तक कम हो गया है. जंग में सौ फीसदी सुरक्षा कभी नहीं होती. फिर भी हर नया कदम जवान की जान बचाने की दिशा में होता है. यही सेना की असली ताकत है.
क्या यह भविष्य की जंग की झलक है?
गणतंत्र दिवस की परेड अक्सर आने वाले समय की तस्वीर दिखाती है. इस बार जंजीरों ने बता दिया कि भविष्य की जंग कैसी होगी. तकनीक तेज होगी लेकिन सुरक्षा उपाय भी उतने ही स्मार्ट होंगे. भारत अपनी सेना को अनुभव और आधुनिक सोच से मजबूत कर रहा है. यह सिर्फ हथियारों की बात नहीं है. यह रणनीति और समझ की भी लड़ाई है. और इसी समझ से दुश्मन सबसे ज्यादा डरता है.


