ईरान में रजा पहलवी की वापसी से बढ़ सकती हैं भारत की मुश्किलें, क्या है चिंता का कारण?

ईरान में रजा पहलवी की वापसी की मांग तेज हो रही है, लेकिन इतिहास बताता है कि शाह शासन भारत के लिए अनुकूल नहीं रहा. सत्ता परिवर्तन की स्थिति में भारत के रणनीतिक हितों को नई चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है.

Shraddha Mishra

ईरान एक बार फिर गंभीर राजनीतिक उथल-पुथल के दौर से गुजर रहा है. जनवरी 2026 की कड़ाके की ठंड में तेहरान से लेकर मशहद तक सड़कों पर बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन देखने को मिल रहे हैं. इन प्रदर्शनों में एक नाम लगातार गूंज रहा है- रजा पहलवी. रजा पहलवी ईरान के आखिरी शाह मोहम्मद रजा पहलवी के बेटे हैं, जिन्हें 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद देश छोड़ना पड़ा था.

प्रदर्शनकारी मौजूदा सर्वोच्च नेता अयातुल्ला खामेनेई के शासन से नाराज हैं और बदलाव की मांग कर रहे हैं. कई लोग शाह परिवार की वापसी को समाधान के रूप में देख रहे हैं. पहली नजर में यह लोकतंत्र और आजादी की लड़ाई लग सकती है, लेकिन अगर भारत के नजरिए से देखा जाए. इतिहास के पन्ने पलटें, तो भारत के लिए यह स्थिति काफी जटिल है. 

शाह का दौर: भारत के लिए मुश्किल समय

1979 से पहले ईरान में शाह का शासन था और उस समय ईरान और पाकिस्तान के रिश्ते बेहद मजबूत थे. शाह पाकिस्तान को अपनी सुरक्षा के लिए जरूरी मानते थे और उसे एक सुरक्षा दीवार की तरह देखते थे. 1965 और 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान ईरान ने खुलकर पाकिस्तान का समर्थन किया था.

इतिहास के दस्तावेज बताते हैं कि ईरान ने पाकिस्तान को ईंधन उपलब्ध कराया और अपने लड़ाकू विमान भी मदद के लिए दिए. जब भारतीय वायुसेना पाकिस्तान पर भारी पड़ी, तब पाकिस्तानी विमानों को ईरान के हवाई अड्डों पर शरण तक मिली. अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी शाह ने भारत के खिलाफ बयान दिए. उस समय ईरान और पाकिस्तान दोनों अमेरिका समर्थित गुट का हिस्सा थे, जबकि भारत सोवियत संघ के करीब था. इस कारण शाह का ईरान भारत के लिए एक तरह से 'दुश्मन का दोस्त' था. 

इस्लामी क्रांति के बाद बदला समीकरण

1979 की इस्लामी क्रांति के बाद अयातुल्ला खामेनेई सत्ता में आए. दुनिया को लगा कि एक कट्टर धार्मिक शासन भारत जैसे देश के लिए समस्या बनेगा, लेकिन समय के साथ तस्वीर अलग निकली. भू-राजनीति ने नए रास्ते खोले. अयातुल्ला शासन के दौरान ईरान और पाकिस्तान के रिश्तों में दूरी बढ़ी. ईरान ने अमेरिका को अपना दुश्मन घोषित किया, जबकि पाकिस्तान अमेरिका का करीबी बना रहा. 

इसके अलावा शिया-सुन्नी तनाव और सऊदी अरब की भूमिका ने भी ईरान-पाकिस्तान संबंधों को कमजोर किया. इसी दौरान भारत और ईरान एक-दूसरे के करीब आए. 1990 के दशक में अफगानिस्तान में तालिबान के खिलाफ भारत और ईरान ने मिलकर नॉर्दर्न अलायंस का समर्थन किया. यही वह दौर था जब दोनों देशों के रणनीतिक रिश्ते सबसे मजबूत हुए. चाबहार बंदरगाह जैसी परियोजनाएं भारत के लिए बेहद अहम बन गईं.

रजा पहलवी के लौटने से क्या बदलेगा?

अब अगर रजा पहलवी या कोई पश्चिम समर्थक सरकार ईरान में सत्ता में आती है, तो भारत के लिए स्थिति बदल सकती है. रजा पहलवी अमेरिका में रहते हैं और पश्चिमी देशों के करीब माने जाते हैं. ऐसे में ईरान और अमेरिका के रिश्ते सुधर सकते हैं, जिससे पाकिस्तान को फिर से ईरान का समर्थन मिल सकता है.

इसका असर भारत की रणनीतिक योजनाओं पर पड़ सकता है. चाबहार बंदरगाह का महत्व कम हो सकता है और पाकिस्तान-चीन-ईरान के बीच नए समीकरण बन सकते हैं. कश्मीर जैसे मुद्दों पर भी ईरान का रुख बदलने की आशंका है, क्योंकि शाह परिवार का झुकाव ऐतिहासिक रूप से पाकिस्तान की ओर रहा है.

भारत के लिए बढ़ेंगी चुनौतियां

ईरान के लोगों की आज़ादी की इच्छा को समझा और सम्मान किया जाना चाहिए, लेकिन अंतरराष्ट्रीय राजनीति भावनाओं पर नहीं चलती. सच्चाई यह है कि अब तक एक अलग-थलग ईरान भारत के लिए रणनीतिक रूप से ज्यादा उपयोगी साबित हुआ है. अगर ईरान पूरी तरह अमेरिका और पाकिस्तान के करीब चला गया, तो भारत के लिए नई चुनौतियां खड़ी हो सकती हैं.

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