क्या होता है स्प्लैशडाउन? कैसे धरती पर लौटेंगे शुभांशु शुक्ला, यहां समझिए पूरी प्रक्रिया

भारतीय अंतरिक्ष यात्री शुभांशु शुक्ला अंतरिक्ष में 18 दिन बिताने के बाद आज धरती पर लौटने वाले हैं. वह ड्रैगन स्पेसक्राफ्ट में सवार होकर कैलिफोर्निया तट के पास समुद्र में स्प्लैशडाउन करेंगे. यह प्रक्रिया अंतरिक्ष मिशन की सबसे चुनौतीपूर्ण और तकनीकी रूप से जटिल स्टेज मानी जाती है, जिसमें हर सेकंड की भूमिका अहम होती है.

Deeksha Parmar
Edited By: Deeksha Parmar

अंतरिक्ष में 18 दिन बिताने के बाद भारतीय अंतरिक्ष यात्री शुभांशु शुक्ला आज धरती पर लौटने वाले हैं. उनका यह ऐतिहासिक मिशन अब अपने अंतिम पड़ाव पर है. शुभांशु और उनकी टीम ड्रैगन स्पेसक्राफ्ट के ज़रिए दोपहर 3:01 बजे कैलिफोर्निया तट के पास समुद्र में 'स्प्लैशडाउन' करेंगे. यह प्रक्रिया जितनी रोमांचक है, उतनी ही तकनीकी और चुनौतीपूर्ण भी.

स्प्लैशडाउन यानी अंतरिक्ष यान की समुद्र में सुरक्षित लैंडिंग की प्रक्रिया बेहद संवेदनशील होती है. इसमें हर सेकंड की गणना, हर स्टेप की तैयारी पहले से तय होती है. आइए समझते हैं कैसे लौटेंगे अंतरिक्ष से धरती पर हमारे भारतीय हीरो शुभांशु शुक्ला.

क्या होता है स्प्लैशडाउन?

स्प्लैशडाउन वह प्रक्रिया होती है, जिसमें स्पेसक्राफ्ट समुद्र में पैराशूट की मदद से धीरे-धीरे उतरता है. इस प्रक्रिया में स्पेसक्राफ्ट की स्पीड को पहले नियंत्रित किया जाता है और फिर पैराशूट के ज़रिए उसकी रफ्तार इतनी कम कर दी जाती है कि वह बिना नुकसान के पानी में उतर सके. शुभांशु और उनकी टीम भी इसी प्रक्रिया के तहत धरती पर लौटेंगे.

डी-ऑर्बिट बर्न: सबसे अहम स्टेप

शुभांशु का स्पेसक्राफ्ट पृथ्वी की ओर 28,000 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से बढ़ रहा है. इस स्पीड को कम करना ज़रूरी होता है ताकि वायुमंडल में घर्षण से जलने का खतरा न हो. स्प्लैशडाउन से 54 मिनट पहले यानी दोपहर 2:07 बजे डी-ऑर्बिट बर्न किया जाएगा, जिसमें थ्रस्टर की मदद से रफ्तार को घटाकर 24 किमी/घंटा तक लाया जाएगा.

धरती की ओर बढ़ते ही गर्मी की दीवार

जैसे ही स्पेसक्राफ्ट पृथ्वी के वायुमंडल में दाखिल होगा, घर्षण के कारण तापमान 1600 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच सकता है. हालांकि, कैप्सूल के अंदर तापमान 29-30 डिग्री तक बनाए रखा जाता है ताकि एस्ट्रोनॉट्स को कोई परेशानी न हो.

मिनट-दर-मिनट तय है पूरा मिशन

2:07 PM – डी-ऑर्बिट बर्न

2:26 PM – ट्रंक यानी पीछे का हिस्सा अलग

2:30 PM – नोजकोन (ऊपरी कवर) बंद

2:57 PM – 6 किमी ऊंचाई पर स्टेबलाइजिंग पैराशूट खुलेंगे

2:58 PM – मेन पैराशूट खुलेंगे

3:01 PM – कैलिफोर्निया तट के पास समुद्र में स्प्लैशडाउन

समंदर में कैसे की जाती है रिकवरी?

कैप्सूल के पैराशूट उसकी रफ्तार को घटाकर 24 किमी/घंटा तक ला देते हैं. इसके बाद वह धीरे से समंदर में उतरता है. पहले से मौजूद रिकवरी टीम बड़ी बोट से पहुंचती है और कैप्सूल को बाहर निकालती है. फिर नोज खोलकर एस्ट्रोनॉट्स को बाहर लाया जाता है और उन्हें मेडिकल चेकअप और आइसोलेशन के लिए विशेष सेंटर ले जाया जाता है.

क्यों जरूरी होता है स्पेस शूट?

इस पूरे मिशन के दौरान शुभांशु और अन्य यात्री स्पेशल स्पेस शूट पहने रहते हैं. यह शूट तापमान, प्रेशर और सुरक्षा के लिहाज से उन्हें सुरक्षित रखते हैं. स्प्लैशडाउन के दौरान भी यह शूट ज़रूरी होता है, क्योंकि यह ऑक्सीजन, तापमान और संभावित झटकों से रक्षा करता है.

भारत के लिए गर्व का क्षण

शुभांशु शुक्ला का यह मिशन भारत के लिए ऐतिहासिक उपलब्धि है. यह साबित करता है कि भारतीय वैज्ञानिक और एस्ट्रोनॉट्स न सिर्फ अंतरिक्ष मिशन में भाग ले रहे हैं, बल्कि लीड रोल निभा रहे हैं. शुभांशु की सुरक्षित वापसी पर पूरे देश की नज़रें टिकी हैं.

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