अगले पंचा सालों तक अमेरिका से क्या-क्या खरीदेगा भारत, क्या डिमांड पूरी कर पाएंगी अमेरिकी कंपनियां?

हाल ही में हुए भारत और अमेरिका के बीच ट्रेड डील ने वैश्विक कारोबार जगत में हलचल मचा दी है. इस डील के तहत भारत अगले पांच सालों में अमेरिका से करीब 500 अरब डॉलर का सामान आयात करेगा. अब सवाल ये है की भारत अमेरिका से क्या-क्या खरीदेगा और क्या अमरीकी सप्लायर्स ये मांगे पूरी कर पिएंगे ?

Yogita Pandey
Edited By: Yogita Pandey

नई दिल्ली: भारत और अमेरिका के बीच हाल ही में हुए ट्रेड डील ने दुनिया भर में हलचल मचा दी है. इस समझौते के तहत भारत अगले 5 सालों तक अमेरिका से 500 अरब डॉलर यानी लगभग 41 लाख करोड़ रूपए के बराबर अमेरिकी सामान इम्पोर्ट करेगा. यह समझौता न केवल दोनों देशो के आर्थिक और व्यापारिक रिश्तों को नई ऊंचाइयों तक ले जायेगा बल्कि वैश्विक सप्लाई चैन की दिशा भी तय करेगा. 

हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि इस लक्ष्य की सफलता केवल भारतीय खरीदारों पर ही निर्भर नहीं करेगी बल्कि इस बात पर भी टिकी होगी कि क्या अमेरिकी कंपनियां इतनी बड़ी मांग को तेजी और निरंतरता से पूरा कर पाएंगी या नहीं. दोनों देशो द्वारा संयुक्त आधिकारिक घोषणा के बाद से ये सवाल सभी के मन में आ रहा है की भारत किन सेक्टरों में सबसे ज्यादा खरीद करेगा और अमेरिकी सप्लायर्स या विक्रेताओं के सामने क्या चुनौतियां आएंगी. .

ऊर्जा क्षेत्र बनेगा 500 अरब डॉलर का आधार

इस आयात लक्ष्य को हासिल करने में ऊर्जा क्षेत्र सबसे अहम भूमिका निभाने वाला है. मौजूदा वित्त वर्ष के पहले नौ महीनों में भारत ने अमेरिका से लगभग 40 अरब डॉलर का आयात किया है, जिसमें से 11 अरब डॉलर सिर्फ कच्चे तेल और पेट्रोलियम उत्पादों का था. यह आंकड़ा पिछले साल की तुलना में करीब 35 प्रतिशत अधिक है.

रूस से हटकर अमेरिका की ओर भारत

भारत अब अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए रूस की बजाय अमेरिका पर ज्यादा भरोसा करने की दिशा में बढ़ रहा है. इंडोनेशिया से आने वाले कोकिंग कोल की जगह अमेरिकी कोयले को प्राथमिकता दी जा सकती है. अधिकारियों के अनुसार, अमेरिकी कोयला गुणवत्ता में बेहतर होने के साथ-साथ कीमत के लिहाज से भी प्रतिस्पर्धी है.

इसके अलावा भारतीय तेल कंपनियां पहले ही अधिक तरल प्राकृतिक गैस (LNG) खरीदने के लिए समझौतों पर हस्ताक्षर कर चुकी हैं.

हाई-टेक और विमानन सेक्टर पर बड़ा फोकस

वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल के मुताबिक, चिप्स, सेमीकंडक्टर और हवाई जहाज जैसे हाई-टेक उत्पाद इस 500 अरब डॉलर के लक्ष्य तक पहुंचने की कुंजी होंगे. भारत अकेले बोइंग को 70 से 80 अरब डॉलर के नए ऑर्डर देने की तैयारी में है.

डेटा सेंटर्स और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की बढ़ती जरूरतों के चलते ग्राफिक्स प्रोसेसिंग यूनिट्स (GPU) और हाई-एंड चिप्स की खरीद में भी तेज उछाल आने की संभावना है.

सप्लाई चेन और बैकलॉग बनी बड़ी चुनौती

इस महत्वाकांक्षी योजना की राह में कुछ बड़ी अड़चनें भी हैं. उदाहरण के तौर पर, बोइंग जैसी अमेरिकी कंपनियों के पास पहले से ही भारी मात्रा में पेंडिंग ऑर्डर्स हैं. ऐसे में यह सवाल अहम है कि क्या वे भारतीय ग्राहकों को समय पर डिलीवरी दे पाएंगी.

इसी तरह, वैश्विक बाजार में सेमीकंडक्टर चिप्स की मांग पहले से ही बहुत अधिक है. भारतीय खरीदारों को इन उत्पादों के लिए वैश्विक सप्लाई चेन की लंबी कतार में अपनी जगह बनानी होगी.

यह अमेरिकी विक्रेताओं पर निर्भर करता है -पीयूष गोयल

पीयूष गोयल ने इस संदर्भ में कहा, "यह अमेरिकी विक्रेताओं पर निर्भर करता है कि वे भारतीय खरीदारों को ऐसा प्रस्ताव दें जिसे वे ठुकरा न सकें. 100 अरब डॉलर प्रति वर्ष का लक्ष्य पहले ही साल में शायद पूरा न हो, लेकिन हम उसी दिशा में बढ़ रहे हैं."

100 अरब डॉलर प्रति वर्ष का लम्बा रोडमैप

विशेषज्ञों का मानना है कि अगर भारत हर साल अमेरिका से 100 अरब डॉलर का आयात करता है, तो अमेरिका भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार ही नहीं, बल्कि सबसे बड़ा ऊर्जा आपूर्तिकर्ता भी बन सकता है. इससे भारत की रूस पर निर्भरता कम होगी और अमेरिका के साथ रणनीतिक संबंध और मजबूत होंगे.

सिर्फ व्यापार नहीं, बड़ा कूटनीतिक संदेश

यह समझौता महज आर्थिक नहीं, बल्कि एक बड़ा कूटनीतिक कदम भी माना जा रहा है. जहां भारत को 18 प्रतिशत तक कम टैरिफ का लाभ मिल रहा है, वहीं अमेरिका को 500 अरब डॉलर का सुनिश्चित बाजार हासिल हुआ है. अब असली परीक्षा इस बात की है कि अमेरिकी फैक्ट्रियां और तेल क्षेत्र भारत की इस विशाल मांग को कितनी तेजी से पूरा कर पाते हैं.

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