UGC के नए नियमों पर देशभर में विरोध...सरकार तलाश रही बीच का रास्ता, खत्म करने के लिए उठा सकती है आवश्यक कदम

UGC के नए नियम लागू करने के बाद देशभर में विरोध प्रदर्शन को देखते हुए केंद्र सरकार बीच का रास्ता तलाशने वाले कई कदमों को उठाने पर विचार कर रही है. सरकार का मानना है कि किसी भी वर्ग के साथ कोई भेदभाव ना हो. यह भी कहा जा रहा है कि सरकार इस कानून को वापस भी ले सकती है.

Utsav Singh
Edited By: Utsav Singh

नई दिल्ली : कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में भेदभाव समाप्त करने के उद्देश्य से लागू किए गए UGC के नए नियमों को लेकर केंद्र सरकार अब पुनर्विचार के मूड में नजर आ रही है. व्यापक विरोध और बढ़ते भ्रम को देखते हुए सरकार ऐसे विकल्पों पर विचार कर रही है, जिससे सभी वर्गों की चिंताओं का समाधान निकाला जा सके. उच्चस्तरीय सूत्रों का कहना है कि नियमों को लेकर गलत धारणाएं बनाई जा रही हैं, जिन्हें दूर करने के लिए जरूरी कदम उठाए जाएंगे.

विरोध की जड़ में क्या है असली विवाद

सूत्रों के अनुसार, विवाद की मुख्य वजह वर्ष 2012 के उन प्रावधानों को हटाया जाना है, जिनमें झूठी या दुर्भावनापूर्ण शिकायतों पर कार्रवाई का प्रावधान था. सरकार अब इस बात पर मंथन कर रही है कि नए नियमों में 2012 के ढांचे को आधार बनाकर संशोधन किया जाए, ताकि भेदभाव की शिकायतों की सुनवाई भी हो और किसी वर्ग को कानून के दुरुपयोग का डर भी न रहे.

सभी वर्गों की आशंकाएं कर रहीं हैं चिंता
नए नियमों को लेकर एक तरफ जहां सामान्य वर्ग इसे अपने खिलाफ मान रहा है, वहीं अनुसूचित जाति और जनजाति के भीतर भी यह चिंता उभर रही है कि अन्य पिछड़ा वर्ग को शामिल किए जाने से कहीं उनके लिए बनाए गए संरक्षण कमजोर न पड़ जाएं. सरकार का कहना है कि उसका उद्देश्य किसी एक वर्ग को लाभ पहुंचाना नहीं, बल्कि हर तरह के भेदभाव को खत्म करना है.

संशोधन या पूरी तरह वापसी पर विचार
सूत्रों के मुताबिक, सरकार को विभिन्न सामाजिक समूहों, शिक्षाविदों और छात्रों से जो फीडबैक मिल रहा है, उसके आधार पर नियमों में जरूरी संशोधन किए जा सकते हैं. यदि सहमति नहीं बनती है, तो इन नियमों को वापस लेने का विकल्प भी खुला रखा गया है. उल्लेखनीय है कि UGC ने 15 जनवरी 2026 से पूरे देश में 2012 के पुराने नियमों की जगह नए विनियम लागू किए थे.

सुप्रीम कोर्ट पहुंचा मामला, BHU छात्र नेता की याचिका
इस बीच, वाराणसी से इस मामले ने कानूनी रूप भी ले लिया है. बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के छात्र नेता मृत्युंजय तिवारी ने UGC के नए नियमों को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है. अधिवक्ता नीरज सिंह के माध्यम से दाखिल याचिका में संविधान के अनुच्छेद 32 का हवाला दिया गया है.

जाति-आधारित भेदभाव की परिभाषा पर सवाल
याचिका में विशेष रूप से UGC विनियम 3(ग) को चुनौती दी गई है, जिसमें ‘जाति-आधारित भेदभाव’ की परिभाषा केवल एससी, एसटी और ओबीसी तक सीमित की गई है. याची का तर्क है कि यह प्रावधान संविधान के समानता के सिद्धांत के विपरीत है. उन्होंने अदालत से मांग की है कि या तो इस नियम को असंवैधानिक घोषित कर रद्द किया जाए या फिर इसमें संशोधन कर किसी भी व्यक्ति के खिलाफ उसकी जाति के आधार पर होने वाले भेदभाव को शामिल किया जाए.

आगे क्या होगा फैसला
सरकार के पुनर्विचार और सुप्रीम कोर्ट में लंबित याचिका के चलते UGC के नए नियमों का भविष्य फिलहाल अनिश्चित नजर आ रहा है. आने वाले दिनों में यह स्पष्ट होगा कि सरकार संशोधन का रास्ता अपनाती है या नियमों को पूरी तरह वापस लेने का फैसला करती है.

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