बांग्लादेश में चुनावी हलचल के बीच भारत के लिए नई रणनीतिक चुनौती, चीन के बाद अब अमेरिका की चाल से बढ़ी चिंता

बांग्लादेश के चुनाव नजदीक हैं। इसी बीच जमात-ए-इस्लामी को लेकर अमेरिका की सक्रियता सामने आई है। चीन और पाकिस्तान पहले से मौजूद हैं। भारत के लिए यह संकेत आसान नहीं।

Lalit Sharma
Edited By: Lalit Sharma

बांग्लादेश में आम चुनाव अब कुछ ही हफ्तों दूर हैं। इस चुनाव का असर सिर्फ ढाका तक सीमित नहीं रहता। नई दिल्ली तक इसकी गूंज सुनाई देती है। बीते वर्षों में भारत और बांग्लादेश के रिश्ते स्थिर रहे हैं। सुरक्षा और कनेक्टिविटी में सहयोग बढ़ा है। लेकिन सत्ता संतुलन बदलते ही हालात बदल सकते हैं। खासकर तब, जब कट्टरपंथी ताकतें फिर सक्रिय हों। यही वजह है कि यह चुनाव भारत के लिए साधारण नहीं हैं।

अमेरिका जमात के करीब क्यों दिख रहा है?

रिपोर्टों के मुताबिक United States के कुछ राजनयिक बांग्लादेश में जमात-ए-इस्लामी से संवाद बढ़ा रहे हैं। वॉशिंगटन पोस्ट की एक रिपोर्ट में बंद कमरे की बातचीत का जिक्र है। इसमें जमात के चुनावी प्रदर्शन को लेकर आकलन किया गया। यह वही जमात है, जिस पर पहले प्रतिबंध लग चुका है। अमेरिका का यह रुख कई सवाल खड़े करता है। खासकर भारत के नजरिए से।

चीन और पाकिस्तान पहले से क्यों सक्रिय हैं?

अमेरिका से पहले चीन और पाकिस्तान जमात के साथ संपर्क बढ़ा चुके हैं। दोनों देशों को अंदाजा है कि चुनाव में बीएनपी बड़ी पार्टी बन सकती है। इसके बावजूद जमात की भूमिका अहम रहेगी। चीन और पाकिस्तान जमात को भारत के प्रभाव के खिलाफ संतुलन मानते हैं। यही कारण है कि संवाद लगातार जारी है। यह गतिविधि सिर्फ चुनाव तक सीमित नहीं दिखती।

जमात की ताकत किस बात से बनती है?

जमात-ए-इस्लामी की सड़कों पर पकड़ अब भी मजबूत मानी जाती है। संगठन का कैडर सक्रिय है। छात्र संगठनों में उसका प्रभाव है। कई सामाजिक संस्थानों में उसकी मौजूदगी रही है। इतिहास में उस पर प्रतिबंध लगे हैं। फिर भी उसकी राजनीतिक प्रासंगिकता खत्म नहीं हुई। यही बात उसे बाहरी ताकतों के लिए उपयोगी बनाती है। भारत के लिए यह सीधा खतरा नहीं, लेकिन चेतावनी जरूर है।

भारत के लिए टेंशन क्यों बढ़ती है?

जमात की पाकिस्तान से नजदीकी किसी से छुपी नहीं है। भारत विरोधी नैरेटिव का इस्तेमाल पहले भी होता रहा है। अगर जमात को अंतरराष्ट्रीय समर्थन मिलता है, तो उसका आत्मविश्वास बढ़ेगा। इससे सड़कों पर विरोध और अस्थिरता का जोखिम रहेगा। भारत के खिलाफ माहौल बनाना आसान हो सकता है। यही चिंता नई दिल्ली को सतर्क करती है। यह सिर्फ राजनीति नहीं, सुरक्षा से जुड़ा मामला है।

अस्थिर बांग्लादेश से क्या खतरे हैं?

अगर बांग्लादेश में राजनीतिक अस्थिरता बढ़ती है, तो उसका असर सीमावर्ती इलाकों पर पड़ेगा। घुसपैठ और कट्टरपंथी गतिविधियों का खतरा बढ़ सकता है। सुरक्षा एजेंसियों पर दबाव बढ़ेगा। निवेश और कनेक्टिविटी परियोजनाएं भी प्रभावित हो सकती हैं। भारत के पूर्वोत्तर राज्यों पर इसका सीधा असर पड़ता है। इसलिए ढाका की स्थिरता नई दिल्ली के हित में है।

भारत को अब क्या रणनीति चाहिए?

भारत के सामने चुनौती साफ है। उसे बांग्लादेश के सभी लोकतांत्रिक पक्षों से संवाद बनाए रखना होगा। साथ ही सुरक्षा हितों पर समझौता नहीं किया जा सकता। चीन, पाकिस्तान और अब अमेरिका की सक्रियता संकेत दे रही है। दक्षिण एशिया में शक्ति संतुलन फिर बदल रहा है। ऐसे में भारत को शांत लेकिन सतर्क कूटनीति अपनानी होगी। यही ऑप्शन सबसे व्यावहारिक दिखता है।

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