यूरोप खुद के खिलाफ जंग को फंड कर रहा है..., भारत-EU ट्रेड डील के बीच बेसेंट का हमला
अमेरिकी ट्रेजरी सचिव स्कॉट बेसेंट ने ट्रंप सरकार के भारत पर भारी टैरिफ थोपने के फैसले का बचाव करते हुए, उन्होंने कहा कि यूरोपीय देश रूसी तेल से बने रिफाइंड प्रोडक्ट्स खरीदकर अपनी ही सुरक्षा को कमजोर कर रहे हैं और युद्ध को अनजाने में फंडिंग दे रहे हैं.

नई दिल्ली: यूरोप भले ही रूस के साथ अपने प्रत्यक्ष ऊर्जा संबंधों को काफी हद तक खत्म कर चुका हो, लेकिन अमेरिकी ट्रेजरी सचिव स्कॉट बेसेंट का कहना है कि युद्ध से जुड़ा पैसा अब भी घूम-फिरकर मास्को तक पहुंच रहा है. उन्होंने आरोप लगाया कि यूरोपीय खरीदार अप्रत्यक्ष रूप से रूस-यूक्रेन युद्ध को फंड कर रहे हैं, क्योंकि वे भारत में रूसी कच्चे तेल से बने रिफाइंड उत्पाद खरीद रहे हैं.
यह बयान ऐसे समय आया है, जब भारत और यूरोपीय संघ मंगलवार को एक उच्चस्तरीय शिखर सम्मेलन में औपचारिक रूप से व्यापक मुक्त व्यापार समझौते पर बातचीत पूरी होने की घोषणा करने जा रहे हैं. बेसेंट ने मीडिया से बातचीत में भारत पर लगाए गए टैरिफ का बचाव करते हुए यूरोपीय देशों की ऊर्जा नीति पर सवाल उठाए.
यूरोप पर अप्रत्यक्ष रूप से युद्ध फंड का आरोप
मीडिया से रविवार को बातचीत में स्कॉट बेसेंट ने कहा कि यूरोपीय सरकारें अपनी ही सुरक्षा नीति को कमजोर कर रही हैं. उनके मुताबिक, यूरोप भले ही सीधे रूस से तेल न खरीदे, लेकिन भारत से रिफाइंड उत्पाद खरीदकर वह उसी तेल का इस्तेमाल कर रहा है, जो रूसी कच्चे तेल से तैयार होता है.
बेसेंट ने कहा कि हमने रूस से तेल खरीदने पर भारत पर 25 प्रतिशत टैरिफ लगाया है. अंदाज़ा लगाइए पिछले हफ्ते क्या हुआ? यूरोपीय देशों ने भारत के साथ व्यापार समझौता कर लिया. उन्होंने आगे कहा कि फिर से स्पष्ट कर दूं कि रूसी तेल भारत में जाता है, परिष्कृत उत्पाद बाहर आते हैं और यूरोपीय देश परिष्कृत उत्पादों को खरीदते हैं. वे अपने ही खिलाफ युद्ध को बढ़ा रहे हैं.
अमेरिका बनाम यूरोप
स्कॉट बेसेंट ने इस मुद्दे को अमेरिका और उसके सहयोगियों के बीच बलिदान के असंतुलन के रूप में पेश किया. उन्होंने कहा कि वाशिंगटन ने रूस से ऊर्जा निर्भरता कम करने और कड़े टैरिफ लगाने जैसे कदम उठाए हैं, जबकि यूरोप वैश्विक तेल व्यापार की खामियों से आर्थिक फायदा उठाता रहा है.
उनका कहना था कि डोनाल्ड ट्रंप रूस-यूक्रेन संघर्ष को खत्म करने के लिए बातचीत की कोशिश कर रहे हैं और इस प्रक्रिया में अमेरिका ने आर्थिक और राजनीतिक रूप से सबसे ज्यादा कीमत चुकाई है.
ट्रांसअटलांटिक रिश्तों में फिर उभरा तनाव
ट्रेड और ऊर्जा एक बार फिर अमेरिका और यूरोप के बीच तनाव का कारण बन गए हैं. वाशिंगटन का संकेत है कि वह यूरोप के प्रतिबंधों और उनके क्रियान्वयन के चयनात्मक रवैये से असंतुष्ट है.
भारत--यूरोप व्यापार समझौता
करीब दो दशक पहले, 2007 में शुरू हुई भारत-यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौते की बातचीत अब अंतिम चरण में पहुंच चुकी है. यह समझौता बदलते वैश्विक व्यापार परिदृश्य में भारत-ईयू के आर्थिक और रणनीतिक साझेदारी का आधार बनने की उम्मीद है.
समझौते से जुड़े अधिकारियों के अनुसार, इसमें भारतीय निर्यातकों को कई क्षेत्रों में शुल्क-मुक्त या रियायती पहुंच मिल सकती है. खास तौर पर टेक्सटाइल, केमिकल्स, जेम्स एंड ज्वैलरी, इलेक्ट्रिकल मशीनरी, लेदर गुड्स, ऑटोमोबाइल और फुटवियर जैसे श्रम-प्रधान क्षेत्रों को फायदा होने की संभावना है.
ट्रंप ने भारतीय उत्पादों पर 50 प्रतिशत तक टैरिफ लगाए हैं, जिनमें रूसी तेल खरीद से जुड़ा 25 प्रतिशत शुल्क भी शामिल है. अगस्त में इन उपायों को दोगुना कर दिया गया था, जिससे वाशिंगटन और नई दिल्ली के बीच व्यापारिक तनाव बढ़ गया.
बेसेंट के बयान
हालांकि, बेसेंट ने हाल के बयानों में टैरिफ में संभावित राहत के संकेत दिए हैं. वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम के दौरान पॉलिटिको से बातचीत में उन्होंने कहा कि भारतीय रिफाइनरियों द्वारा रूसी कच्चे तेल की खरीद में तेज गिरावट आई है. बेसेंट ने कहा कि भारतीय रिफाइनरियों द्वारा रूसी तेल की खरीद ठप हो गई है. यह एक सफलता है. टैरिफ अभी भी लागू हैं, रूसी तेल पर 25 प्रतिशत टैरिफ अभी भी लागू हैं. मुझे लगता है कि इन्हें हटाने का कोई रास्ता जरूर होगा.
मीडिया के हवाले से जारी आंकड़ों के अनुसार, दिसंबर में भारत का रूसी तेल आयात दो वर्षों के निचले स्तर पर पहुंच गया, जबकि ओपेक देशों से तेल आयात की हिस्सेदारी 11 महीने के उच्चतम स्तर पर रही.


