ग्रीनलैंड पर क्यों है अमेरिका की नजर? जानिए क्या है इस द्वीप की सैन्य ताकत और रणनीतिक अहमियत
ग्रीनलैंड अपनी रणनीतिक स्थिति, मिसाइल डिफेंस, आर्कटिक समुद्री मार्गों और खनिज संसाधनों के कारण अमेरिका की नजर में है. यहां सीमित डेनिश और अमेरिकी सैन्य मौजूदगी है, जबकि अमेरिका-डेनमार्क टकराव की संभावना कम मानी जा रही है.

ग्रीनलैंड दुनिया का सबसे बड़ा द्वीप है, लेकिन यहां की आबादी करीब 56 हजार के आसपास ही है. यह द्वीप भले ही भौगोलिक रूप से विशाल हो, लेकिन प्रशासनिक रूप से डेनमार्क का हिस्सा है. बीते कुछ वर्षों से अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप बार-बार ग्रीनलैंड को खरीदने या उस पर नियंत्रण की बात करते रहे हैं. ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि ग्रीनलैंड में कितनी सेना तैनात है, इसकी रणनीतिक अहमियत क्या है और क्या अमेरिका व डेनमार्क के बीच टकराव की स्थिति बन सकती है.
ग्रीनलैंड में सैन्य मौजूदगी कितनी है?
ग्रीनलैंड की सुरक्षा की जिम्मेदारी डेनमार्क पर है. यह इलाका अब तक काफी हद तक शांत रहा है, इसलिए यहां किसी बड़े सैन्य जमावड़े की जरूरत नहीं पड़ी. हालांकि, कुछ अहम सैन्य और निगरानी केंद्र जरूर मौजूद हैं. डेनमार्क की जॉइंट आर्कटिक कमांड ग्रीनलैंड में तैनात है, जिसमें लगभग 300 सैनिक शामिल हैं. यह कमांड समुद्री निगरानी, खोज और बचाव जैसे कार्यों को संभालती है.
इसके अलावा, ग्रीनलैंड के उत्तर-पश्चिमी हिस्से में अमेरिका का पिटुफिक स्पेस बेस, जिसे पहले थुले एयर बेस कहा जाता था, स्थित है. इस बेस पर करीब 650 अमेरिकी सैनिक और कर्मचारी तैनात हैं. यह ठिकाना मिसाइल चेतावनी प्रणाली और अंतरिक्ष निगरानी के लिहाज से बेहद अहम माना जाता है. कुल मिलाकर, ग्रीनलैंड में कोई बड़ी लड़ाकू सेना नहीं है. यहां सैन्य गतिविधियों का मकसद सीधे युद्ध की तैयारी नहीं, बल्कि निगरानी और सुरक्षा से जुड़ा है.
ग्रीनलैंड पर क्यों है ट्रंप की नजर?
डोनाल्ड ट्रंप ने साल 2019 में पहली बार ग्रीनलैंड को खरीदने की बात कही थी. उनका तर्क था कि यह अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए जरूरी है. डेनमार्क सरकार ने इस प्रस्ताव को सिरे से खारिज कर दिया, जिसके बाद ट्रंप ने नाराजगी में डेनमार्क यात्रा तक रद्द कर दी थी. अब 2026 में यह मुद्दा फिर चर्चा में है और अमेरिका की ओर से यह कहा गया है कि ग्रीनलैंड को लेकर “सभी विकल्प” खुले हैं. डेनमार्क की प्रधानमंत्री मेट्टे फ्रेडरिक्सन ने इस बयान को नाटो (NATO) के लिए खतरा बताया है. यूरोपीय संघ और नाटो के कई सदस्य देशों ने भी अमेरिका के इस रुख पर आपत्ति जताई है.
ग्रीनलैंड इतना अहम क्यों है?
ग्रीनलैंड की अहमियत सिर्फ उसके आकार की वजह से नहीं, बल्कि उसकी भौगोलिक स्थिति के कारण है. रूस के उत्तरी इलाके, खासकर कोला प्रायद्वीप, उसके बड़े सैन्य ठिकानों में गिने जाते हैं.वहां से अमेरिका की ओर जाने वाली मिसाइलों का रास्ता ग्रीनलैंड के ऊपर से गुजरता है. ऐसे में ग्रीनलैंड मिसाइल डिफेंस के लिए अहम बन जाता है.
इसके अलावा, जलवायु परिवर्तन के कारण आर्कटिक क्षेत्र में बर्फ तेजी से पिघल रही है. इससे नए समुद्री रास्ते खुल रहे हैं, जो एशिया और यूरोप के बीच दूरी कम कर सकते हैं. इन रास्तों पर चीन और रूस की बढ़ती गतिविधियां अमेरिका और यूरोप के लिए चिंता का कारण हैं. ग्रीनलैंड इन समुद्री मार्गों पर नजर रखने में मदद कर सकता है. विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि ग्रीनलैंड में मौजूद खनिज संसाधन, तेल और गैस भी अमेरिका की रुचि का कारण हो सकते हैं.
क्या अमेरिका और डेनमार्क के बीच हो सकता है टकराव?
जानकारों के मुताबिक, अमेरिका और डेनमार्क के बीच सीधा सैन्य टकराव होने की संभावना बेहद कम है. दोनों ही देश नाटो के सदस्य हैं और आपसी सहयोग उनके रिश्तों की बुनियाद है. ट्रंप के बयान को अधिकतर लोग दबाव बनाने की रणनीति मानते हैं. डेनमार्क साफ कर चुका है कि ग्रीनलैंड बिकाऊ नहीं है. वहीं ग्रीनलैंड के लोग भी खुद को डेनमार्क से जुड़ा मानते हैं और अमेरिका का हिस्सा बनने के पक्ष में नहीं हैं.


