हिंदू पुरुषों को पेड़ से बांधकर जलाया...बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों का कत्लेआम जारी, सरकार बस कर रही निंदा!

बांग्लादेश में कई हिन्दु लोगों की हत्या हुई.जिसके कारण राजनीतिक अस्थिरता, धार्मिक कट्टरता और संस्थागत कमजोरी के बीच ये हत्याएं तेजी से बढ़ीं, जिससे हिंदू समुदाय में डर का माहौल है.

Sonee Srivastav

नई दिल्ली: बांग्लादेश में दिसंबर 2025 में हिंदू समुदाय के कई लोगों की हत्याएं हुईं. ये घटनाएं अलग-अलग अपराध नहीं हैं, बल्कि हिंदू अल्पसंख्यकों के खिलाफ लंबे समय से चल रही हिंसा और असुरक्षा का हिस्सा हैं. राजनीतिक अस्थिरता, धार्मिक कट्टरता और संस्थागत कमजोरी के बीच ये हत्याएं तेजी से बढ़ीं, जिससे हिंदू समुदाय में डर का माहौल है.

दिसंबर 2025 में हुई हत्याओं का पैटर्न

दिसंबर 2025 में कम से कम कई हिंदू पुरुषों की हत्या हुई, जिनमें ज्यादातर मामलों में भीड़ ने हिंसा की. प्रमुख नामों में दीपू चंद्र दास, अमृत मंडल, प्रंतोष कर्मकार, जोगेश चंद्र रॉय, सुबर्णा रॉय, शांतो दास आदि शामिल हैं. ये हत्याएं अलग-अलग जिलों में हुईं, लेकिन इनमें एक समानता दिखती है - आरोप लगते हैं, जांच से पहले ही भीड़ न्याय करती है और कानूनी प्रक्रिया नजरअंदाज हो जाती है.

उदाहरण के तौर पर दीपू चंद्र दास की हत्या काफी चर्चित हुई. म्यामेंसिंह जिले में एक गारमेंट फैक्ट्री में काम करने वाले दीपू पर इस्लाम के खिलाफ टिप्पणी करने का आरोप लगा. भीड़ ने उन्हें कार्यस्थल से घसीटा, पीटा, सड़क पर ले जाकर पेड़ से बांधा और जिंदा जला दिया.

जांच में बाद में कोई ठोस सबूत नहीं मिला, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी. इसी तरह अमृत मंडल को राजबाड़ी जिले में पीट-पीटकर मार डाला गया. अधिकारियों ने इसे अपराधी पृष्ठभूमि से जोड़ा, लेकिन भीड़ द्वारा मौत देने का तरीका अल्पसंख्यकों में डर पैदा करता है.

धार्मिक कट्टरता और राजनीतिक अस्थिरता का असर

ये हत्याएं ब्लासफेमी (ईशनिंदा) के आरोपों से शुरू होती हैं, जो बिना सबूत के लगाए जाते हैं. ऐसे आरोप हिंदुओं को निशाना बनाने का आसान हथियार बन गए हैं. राजनीतिक उथल-पुथल के दौरान कानून-व्यवस्था कमजोर हो जाती है और हिंदू समुदाय सबसे ज्यादा असुरक्षित हो जाता है.

कट्टर समूह धार्मिक राष्ट्रवाद का इस्तेमाल करते हैं, जिससे अल्पसंख्यकों पर हमले बढ़ते हैं. भारत विरोधी बयानबाजी भी इसमें योगदान देती है, जिससे हिंदुओं को निशाना बनाना आसान हो जाता है.

सरकार की प्रतिक्रिया और कमी

मुहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार ने इन हत्याओं की निंदा की और कुछ गिरफ्तारियां भी हुईं, लेकिन हिंदू समुदाय के लिए ये पर्याप्त नहीं। सुरक्षा का मतलब सिर्फ घटना के बाद कार्रवाई नहीं, बल्कि पहले से रोकथाम, तुरंत हस्तक्षेप और लगातार जवाबदेही है. बार-बार ऐसी घटनाएं होने के बावजूद कोई बड़ा बदलाव नहीं आया. आरोपों की जांच कानूनी तरीके से होनी चाहिए, न कि भीड़ के भरोसे.

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